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Rigveda / 6 / 44 / 14

अ॒स्य मदे॑ पु॒रु वर्पां॑सि वि॒द्वानिन्द्रो॑ वृ॒त्राण्य॑प्र॒ती ज॑घान। तमु॒ प्र हो॑षि॒ मधु॑मन्तमस्मै॒ सोमं॑ वी॒राय॑ शि॒प्रिणे॒ पिब॑ध्यै ॥१४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 44 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒स्य। मदे॑। पु॒रु। वर्पां॑सि। वि॒द्वान्। इन्द्रः॑। वृ॒त्राणि॑। अ॒प्र॒ति। ज॒घा॒न॒। तम्। ऊँ॒ इति॑। प्र। हो॒षि॒। मधु॑ऽमन्तम्। अ॒स्मै॒। सोम॑म्। वी॒राय॑। शि॒प्रिणे॑। पिब॑ध्यै ॥१४॥

पदार्थ : जो (विद्वान्) विद्यायुक्त, जैसे (इन्द्रः) सूर्य्य (वृत्राणि) मेघों का (जघान) नाश करता है, वैसे (अस्य) इस ओषधियों के समूह के (मदे) आनन्दकारक रस में (अप्रती) नहीं विश्वास किये गये (पुरु) बहुत (वर्पांसि) सुन्दर रूपों का निर्म्माण करके स्वीकार करे (तम्) उसके प्रति (उ) भी (मधुमन्तम्) मधुर आदि गुणों से युक्त द्रव्य के साथ (सोमम्) बड़ी ओषधियों के रस को (अस्मै) इस (शिप्रिणे) उत्तम ठुड्ढी और नासिकावाले (वीराय) भयरहित जन के लिये (पिबध्यै) पीने को आप (प्र, होषि) देते हो, इससे सत्कार करने योग्य हो ॥१४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य्य के सदृश न्याय और विजय के प्रकाशक, युक्त आहार और विहारवाले और महौषधियों के रस को पीनेवाले हैं, वे अनेक प्रकार के पदार्थों को प्राप्त होकर इस जगत् में आनन्द करते हैं ॥१४॥