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Rigveda / 6 / 45 / 6

नय॒सीद्वति॒ द्विषः॑ कृ॒णोष्यु॑क्थशं॒सिनः॑। नृभिः॑ सु॒वीर॑ उच्यसे ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 45 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : नय॑सि। इत्। ऊँ॒ इति॑। अति॑। द्विषः॑। कृ॒णोषि॑। उ॒क्थ॒ऽशं॒सिनः॑। नृऽभिः॑। सु॒ऽवीरः॑। उ॒च्य॒से॒ ॥६॥

पदार्थ : हे राजन् ! जिससे आप (द्विषः) द्वेष करनेवालों को (उक्थसंसिनः) वेद की प्रशंसा करनेवाले को (कृणोषि) करते हो और उपाय का उल्लङ्घन करके धर्म्म को (अति, नयसि) अत्यन्त प्राप्त होते वा प्राप्त करते हो (उ) और (नृभिः) नायक अग्रणी मनुष्यों से (सुवीरः) श्रेष्ठ वीरों से युक्त हुए सब के प्रति (उच्यते) उपदेश किये जाते हो इससे (इत्) ही आदर करने योग्य हो ॥६॥

भावार्थ : हे राजन् ! जो आप नम्रतायुक्त, विद्वान् होवें तो वेद में कहे हुए धर्म्म से द्वेष करनेवालों को भी उपदेश वा विनय से वेदोक्त धर्म्म में प्रीतिकरनेवाले कर सकते हो ॥६॥