Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 39 / 8

यु॒ष्मेषि॑तो मरुतो॒ मर्त्ये॑षित॒ आ यो नो॒ अभ्व॒ ईष॑ते । वि तं यु॑योत॒ शव॑सा॒ व्योज॑सा॒ वि यु॒ष्माका॑भिरू॒तिभिः॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 39 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : मरूतः | छन्द : विराट्सतःपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर तुमको उनसे क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : यु॒ष्माऽइ॑षि॑तः । म॒रु॒तः॒ । मर्त्य॑ऽइषितः । आ । यः । नः॒ । अभ्वः॑ । ईष॑ते । वि । तम् । यु॒यो॒त॒ । शव॑सा । वि । ओज॑सा । वि । यु॒ष्माका॑भिः । ऊ॒तिऽभिः॑॥

पदार्थ : हे (मरुतः) विद्वानों ! तुम (यः) जो (अभ्वः) विरोधी मित्र भाव रहित (युष्मेषितः) तुम लोगों को जीतने और (मर्त्येषितः) मनुष्यों से विजय की इच्छा करनेवाला शत्रु (नः) हम लोगों को (ईषते) मारता है उसको (शवसा) बलयुक्त सेना वा (व्योजसा) अनेक प्रकार के पराक्रम और (युष्माकाभिः) तुम्हारी कृपापात्र (ऊतिभिः) रक्षा प्रीति तृप्ति ज्ञान आदिकों से युक्त सेनाओं से (वियुयोत) विशेषता से दूर कर दीजिये ॥८॥

भावार्थ : मनुष्यों को उचित है कि जो स्वार्थी परोपकार से रहित दूसरे को पीड़ा देने में अत्यन्त प्रसन्न शत्रु हैं उनको विद्या वा शिक्षा के द्वारा खोटे कर्मों से निवृत्त कर वा उत्तम सेना बल को संपादन युद्ध से जीत निवारण करके सबके हित का विस्तार करना चाहिये ॥८॥