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Rigveda / 6 / 46 / 6

त्वामु॒ग्रमव॑से चर्षणी॒सहं॒ राज॑न्दे॒वेषु॑ हूमहे। विश्वा॒ सु नो॑ विथु॒रा पि॑ब्द॒ना व॑सो॒ऽमित्रा॑न्त्सु॒षहा॑न्कृधि ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 46 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्रः प्रगाथो वा | छन्द : सतोबृहती | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह राजा कैसा होवे, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वाम्। उ॒ग्रम्। अव॑से। च॒र्ष॒णि॒ऽसह॑म्। राज॑न्। दे॒वेषु॑। हू॒म॒हे॒। विश्वा॑। सु। नः॒। वि॒थु॒रा। पि॒ब्द॒ना। व॒सो॒ इति॑। अ॒मित्रा॑न्। सु॒ऽसहा॑न्। कृ॒धि॒ ॥६॥

पदार्थ : हे (वसो) सुख में वसानेवाले (राजन्) विद्या और विनय से प्रकाशमान ! हम लोग (विश्वा) सम्पूर्ण कार्य्यों के प्रति और (देवेषु) विद्वानों में (अवसे) रक्षण आदि के लिये (उग्रम्) तेजस्वी और (चर्षणीसहम्) शत्रुओं की सेना के सहनेवाले (त्वाम्) आपको (सु, हूमहे) [अच्छी प्रकार] पुकारें और आप (नः) हम लोगों के (अमित्रान्) शत्रुओं को (सुसहान्) सुख के सहने योग्य (कृधि) करिये और (पिब्दना) पीसने योग्य शत्रुसैन्यों को (विथुरा) व्यथायुक्त करिये ॥६॥

भावार्थ : जो राजा मन्त्री और प्रजाजनों के सुख और दुःख को अपने सदृश जान कर जैसे शत्रुओं का पराभव होवे वैसा उपाय करनेवाला होवे, उसी को सब लोग पिता के सदृश मानें ॥६॥