Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 47 / 22

प्र॒स्तो॒क इन्नु राध॑सस्त इन्द्र॒ दश॒ कोश॑यी॒र्दश॑ वा॒जिनो॑ऽदात्। दिवो॑दासादतिथि॒ग्वस्य॒ राधः॑ शाम्ब॒रं वसु॒ प्रत्य॑ग्रभीष्म ॥२२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 47 | Mantra No : 22

In Hindi:

ऋषि : गर्गः | देवता : प्रस्तोकस्य सार्ञ्जयस्य दानस्तुतिः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वे राजा और प्रजाजन परस्पर कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : प्र॒स्तो॒कः। इत्। नु। राध॑सः। ते॒। इ॒न्द्र॒। दश॑। कोश॑यीः। दश॑। वा॒जिनः॑। अ॒दा॒त्। दिवः॑ऽदासात्। अ॒ति॒थि॒ऽग्वस्य॑। राधः॑। शा॒म्ब॒रम्। वसु॑। प्रति॑। अ॒ग्र॒भी॒ष्म॒ ॥२२॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) सूर्य्य के सदृश अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त ! जो (ते) आपके (वाजिनः) बहुत अन्नों से युक्त (राधसः) धन की (दश) दश (कोशयीः) कोशों खजानों को प्राप्त होनेवाली भूमियों की (प्रस्तोकः) स्तुति करनेवाला (अदात्) देता है और (दश) दशगुनी सम्पादित करता और जिस (अतिथिग्वस्य) अतिथियों को प्राप्त होनेवाले के (दिवोदासात्) प्रकाश देनेवाले से प्राप्त हुए (राधः) धन को (शाम्बरम्) और मेघ में हुए (वसु) जलनामक द्रव्य को हम लोग (प्रति, अग्रभीष्म) ग्रहण करें उसको (इत्) ही (नु) शीघ्र आप हम लोगों के लिये दीजिये, उसको ही शीघ्र हम लोग आपके लिये देवें ॥२२॥

भावार्थ : हे राजन् ! जो आपके राज्य में असङ्ख्य धनों को देने, वृष्टि करने तथा अतिथियों के सङ्ग का सेवन करनेवाला जन होवे, उसकी रक्षा को आप करिये और जो हम लोगों को धन प्राप्त होवे, उसको आपके लिये हम लोग देवें और जो आपको प्राप्त होवे उसको हम लोगों के लिये दीजिये ॥२२॥