Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 47 / 28

इन्द्र॑स्य॒ वज्रो॑ म॒रुता॒मनी॑कं मि॒त्रस्य॒ गर्भो॒ वरु॑णस्य॒ नाभिः॑। सेमां नो॑ ह॒व्यदा॑तिं जुषा॒णो देव॑ रथ॒ प्रति॑ ह॒व्या गृ॑भाय ॥२८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 47 | Mantra No : 28

In Hindi:

ऋषि : गर्गः | देवता : रथः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर राजा को बिजुली से क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : इन्द्र॑स्य। वज्रः॑। म॒रुता॑म्। अनी॑कम्। मि॒त्रस्य॑। गर्भः॑। वरु॑णस्य। नाभिः॑। सः। इ॒माम्। नः॒। ह॒व्यऽदा॑तिम्। जु॒षा॒णः। देव॑। र॒थ॒। प्रति॑। ह॒व्या। गृ॒भा॒य॒ ॥२८॥

पदार्थ : हे (देव, रथ) सुन्दर विद्वन् राजन् ! आप जो (मरुताम्) मनुष्यों की (अनीकम्) सेना के सदृश (इन्द्रस्य) बिजुली की (वज्रः) धमक वा शब्द (मित्रस्य) प्राण के (गर्भः) मध्य में स्थित और (वरुणस्य) श्रेष्ठ वायु का (नाभिः) बन्धन है (सः) वह (नः) हम लोगों की (इमाम्) इस (हव्यदातिम्) देने योग्य दान की क्रिया को (जुषाणः) सेवन करता हुआ (हव्या) ग्रहण करने योग्यों को देता है, उसको आप (प्रति, गृभाय) प्रतीति से ग्रहण करिये ॥२८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् जनो ! बिजुली आदि पदार्थों और सम्पूर्ण मूर्त्त द्रव्यों के मध्य में वर्त्तमान कर्म्मों से युक्त सेना को करके विजय से शोभित हूजिये ॥२८॥