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Rigveda / 6 / 48 / 2

ऊ॒र्जो नपा॑तं॒ स हि॒नायम॑स्म॒युर्दाशे॑म ह॒व्यदा॑तये। भुव॒द्वाजे॑ष्ववि॒ता भुव॑द्वृ॒ध उ॒त त्रा॒ता त॒नूना॑म् ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 48 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : आर्चीजगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर राजा और प्रजाजन परस्पर कैसे वर्तें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ऊर्जः। नपा॑तम्। सः। हि॒न। अ॒यम्। अ॒स्म॒ऽयुः। दाशे॑म। ह॒व्यऽदा॑तये। भुव॑त्। वाजे॑षु। अ॒वि॒ता। भुव॑त्। वृ॒धः। उ॒त। त्रा॒ता। त॒नूना॑म् ॥२॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (अयम्) यह (अस्मयुः) हम लोगों की कामना करनेवाला तथा (हव्यदातये) देने योग्य दान के लिये (अविता) रक्षा करनेवाला (भुवत्) होवे और (वाजेषु) सङ्ग्रामों में रक्षा करनेवाला (भुवत्) हो तथा (वृधः) वृद्धि करने वा रक्षा करनेवाला हो (उत) और (तनूनाम्) शरीरों का (त्राता) पालन करनेवाला हो उसको (ऊर्जः) पराक्रम के (नपातम्) न पातन कराने अर्थात् न विनाश करानेवाले की अच्छे प्रकार रक्षा कर हम सुख (दाशेम) देवें (सः, हिन) वही हमारे लिये सुख देवे ॥२॥

भावार्थ : हे प्रजासेनाजनो ! जो राजा सङ्ग्राम वा असङ्ग्राम में सबकी रक्षा करनेवाला निरन्तर हो, तनुकूल वर्ताव कर हम लोग उसके लिये पुष्कल सुख देवें ॥२॥