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Rigveda / 6 / 48 / 11

आ स॑खायः सब॒र्दुघां॑ धे॒नुम॑जध्व॒मुप॒ नव्य॑सा॒ वचः॑। सृ॒जध्व॒मन॑पस्फुराम् ॥११॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 48 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : मरुतः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : कौन इस संसार में मित्र हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। स॒खा॒यः॒। स॒बः॒ऽदुघा॑म्। धे॒नुम्। अ॒ज॒ध्व॒म्। उप॑। नव्य॑सा। वचः॑। सृ॒जध्व॑म्। अन॑पऽस्फुराम् ॥११॥

पदार्थ : हे (सखायः) मित्रवर्गो ! तुम (नव्यसा) अतीव नवीन पढ़ाने वा उपदेश करने से (सबर्दुघाम्) समस्त कामनाओं की पूर्ण करनेवाली (अनपस्फुराम्) निश्चल दृढ़ (धेनुम्) वाणी को (अजध्वम्) प्राप्त करिये तथा (वचः) अर्थात् वचन को (उप, आ, सृजध्वम्) विविध प्रकार की विद्या से युक्त करो ॥११॥

भावार्थ : जो सुहृद् होकर सत्य, सुन्दर शिक्षायुक्त वाणी और विद्या को विद्यार्थियों को ग्रहण कराते हैं, वे संसार के शुद्ध करनेवाले होते हैं ॥११॥