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Rigveda / 6 / 48 / 15

त्वे॒षं शर्धो॒ न मारु॑तं तुवि॒ष्वण्य॑न॒र्वाणं॑ पू॒षणं॒ सं यथा॑ श॒ता। सं स॒हस्रा॒ कारि॑षच्चर्ष॒णिभ्य॒ आँ आ॒विर्गू॒ळ्हा वसू॑ करत्सु॒वेदा॑ नो॒ वसू॑ करत् ॥१५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 48 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : मरुतो लिङ्गोक्ता वा | छन्द : निचृदतिजगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वे॒षम्। शर्धः॑। न। मारु॑तम्। तु॒वि॒ऽस्वणि॑। अ॒न॒र्वाण॑म्। पू॒षण॑म्। सम्। यथा॑। श॒ता। सम्। स॒हस्रा॑। कारि॑षत्। च॒र्ष॒णिऽभ्यः॑। आ। आ॒विः। गू॒ळ्हा। वसु॑। क॒र॒त्। सु॒ऽवेदा॑। नः॒। वसु॑। क॒र॒त् ॥१५॥

पदार्थ : हे विद्वानो ! (यथा) जैसे (सुवेदा) सुशोभित विज्ञान जिसका वह (नः) हम लोगों के लिये (त्वेषम्) दीप्तिमत् (तुविष्वणि) बहुत शब्दोंवाले (मारुतम्) मनुष्य सम्बन्धी (शर्धः) बल के (न) समान (अनर्वाणम्) अविद्यमान हैं अश्व जिसमें उस पदार्थ को (पूषणम्) पुष्टि करनेवाला (करत्) करे वा जैसे (चर्षणिभ्यः) मनुष्यों के लिये (शता) सैकड़ों वा (सहस्रा) सहस्रों (गूळ्हा) गुप्त (वसू) धनों को (आ, सम्, कारिषत्) सब ओर अच्छे प्रकार सिद्ध करे और गुप्त (वसू) विज्ञान वा धनों को (सम्, आविष्करत्) प्रकट करे, वैसे इनको आप करें ॥१५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन विज्ञानदान से गुप्त विद्याओं को तुम्हारे लिये प्रकट करते हैं और आपके शारीरिक और आत्मिक बल को बढ़ाते हैं, वैसे इनको तुम बढ़ाओ ॥१५॥