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Rigveda / 6 / 49 / 10

भुव॑नस्य पि॒तरं॑ गी॒र्भिरा॒भी रु॒द्रं दिवा॑ व॒र्धया॑ रु॒द्रम॒क्तौ। बृ॒हन्त॑मृ॒ष्वम॒जरं॑ सुषु॒म्नमृध॑ग्घुवेम क॒विने॑षि॒तासः॑ ॥१०॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 49 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : ऋजिश्वाः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को कौन प्रशंसा करने योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : भुव॑नस्य। पि॒तर॑म्। गीः॒ऽभिः। आ॒भिः। रु॒द्रम्। दिवा॑। व॒र्धय॑। रु॒द्रम्। अ॒क्तौ। बृ॒हन्त॑म्। ऋ॒ष्वम्। अ॒जर॑म्। सु॒ऽसु॒म्नम्। ऋध॑क्। हु॒वे॒म॒। क॒विना॑। इ॒षि॒तासः॑ ॥१०॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! जैसे (कविना) विद्वान् से (इषितासः) प्रेरणा किये हुए हम लोग (आभिः) इन वर्त्तमान (गीर्भिः) वाणियों से (भुवनस्य) संसार के (पितरम्) पालनेवाले (अक्तौ) रात्रि में (रुद्रम्) दुष्टों को रुलाने और (बृहन्तम्) बढ़ानेवाले (ऋष्वम्) बड़े (अजरम्) जरावस्थारहित (सुषुम्नम्) सुन्दर सुखयुक्त (रुद्रम्) रोग भगानेवाले जन की (ऋधक्) सत्य (हुवेम) स्तुति करें, वैसे इस रुद्र को आप (दिवा) कामना वा विद्यादीप्ति से (वर्धया) बढ़ाओ ॥१०॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्य विद्वान् से प्रेरणा को पाये हुए विद्या और नम्रता के व्यवहार में वृद्ध होकर सब जगत् के पालनेवाले परमात्मा की सत्य व्यवहार से प्रशंसा करें, जिससे अविनाशी सुख को सब प्राप्त हों ॥१०॥