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Rigveda / 6 / 49 / 13

यो रजां॑सि विम॒मे पार्थि॑वानि॒ त्रिश्चि॒द्विष्णु॒र्मन॑वे बाधि॒ताय॑। तस्य॑ ते॒ शर्म॑न्नुपद॒द्यमा॑ने रा॒या म॑देम त॒न्वा॒३॒॑ तना॑ च ॥१३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 49 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : ऋजिश्वाः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या जानने योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यः। रजां॑सि। वि॒ऽम॒मे। पार्थि॑वानि। त्रिः। चि॒त्। विष्णुः॑। मन॑वे। बा॒धि॒ताय॑। तस्य॑। ते॒। शर्म॑न्। उ॒प॒ऽद॒द्यमा॑ने। रा॒या। म॒दे॒म॒। त॒न्वा॑। तना॑। च॒ ॥१३॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यः) जो (विष्णुः) चराचर में प्रवेश होता वह जगदीश्वर (बाधिताय) पीड़ित (मनवे) मनुष्य के लिये (पार्थिवानि) पृथिवी में सिद्ध हुए (रजांसि) लोकों को (त्रिः) तीन वार (चित्) ही (विममे) रचता है (तस्य) उसके सम्बन्ध में (ते) आपके (उपदद्यमाने) समीप ग्रहण किये (शर्मन्) घर में (तना) विस्तृत (राया) धन (तन्वा, च) और शरीर के साथ हम लोग (मदेम) आनन्दित हों ॥१३॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर सब जगत् का निर्माण करके मनुष्यादिकों का उपकार करता है, उसके आश्रय से ही हम लोग धनवान् और बहुत आयुवाले हों ॥१३॥