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Rigveda / 6 / 50 / 6

अ॒भि त्यं वी॒रं गिर्व॑णसम॒र्चेन्द्रं॒ ब्रह्म॑णा जरित॒र्नवे॑न। श्रव॒दिद्धव॒मुप॑ च॒ स्तवा॑नो॒ रास॒द्वाजाँ॒ उप॑ म॒हो गृ॑णा॒नः ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 50 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : ऋजिश्वाः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर विद्वानों को क्या उपदेश कर क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒भि। त्यम्। वी॒रम्। गिर्व॑णसम्। अ॒र्च॒। इन्द्र॑म्। ब्रह्म॑णा। ज॒रि॒तः॒। नवे॑न। श्रव॑त्। इत्। हव॑म्। उप॑। च॒। स्तवा॑नः। रास॑त्। वाजा॑न्। उप॑। म॒हः। गृ॒णा॒नः ॥६॥

पदार्थ : हे (जरितः) स्तुति करनेवाले जन ! आप (महः) बहुत (वाजान्) अन्नादिकों की (गृणानः) प्रशंसा करते हुए (उप, रासत्) समीप में दें और (स्तवानः) स्तुति करते हुए (हवम्) सत्य की प्रशंसा को (उप, श्रवत्) सुनें (इत्) ही तथा (नवेन) नवीन (ब्रह्मणा) धन वा अन्नादि से (त्यम्) उस (गिर्वणसम्) वाणियों से सेव्यमान (वीरम्) वीरवान् तथा (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवान् का (च) भी (अभि, अर्च) सब ओर से सत्कार करो ॥६॥

भावार्थ : हे विद्वन् ! आप सब के प्रश्नों को सुनकर समाधान देते हुए और अन्नादि पदार्थों की प्राप्ति कराते हुए धार्मिक वीरों को और धनाढ्यों को सर्वदा शिक्षा देवें, जिससे इनका ऐश्वर्य अन्याय मार्ग में नष्ट न हो ॥६॥