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Rigveda / 6 / 51 / 7

मा व॒ एनो॑ अ॒न्यकृ॑तं भुजेम॒ मा तत्क॑र्म वसवो॒ यच्चय॑ध्वे। विश्व॑स्य॒ हि क्षय॑थ विश्वदेवाः स्व॒यं रि॒पुस्त॒न्वं॑ रीरिषीष्ट ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 51 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : ऋजिश्वाः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : मा। वः॒। एनः॑। अ॒न्यऽकृ॑तम्। भु॒जे॒म॒। मा। तत्। क॒र्म॒। व॒स॒वः॒। यत्। चय॑ध्वे। विश्व॑स्य। हि। क्षय॑थ। वि॒श्व॒ऽदे॒वाः॒। स्व॒यम्। रि॒पुः। त॒न्व॑म्। रि॒रि॒षी॒ष्ट॒ ॥७॥

पदार्थ : हे (वसवः) वास के हेतु (विश्वदेवाः) सब विद्वानो ! तुम (विश्वस्य) संसार के बीच (यत्) जो (चयध्वे) इकट्ठा करो और (हि) जिससे जिसको (क्षयथ) निवास करो जैसे (रिपुः) शत्रु (तन्वम्) अपने शरीर को (स्वयम्) आप (रीरिषीष्ट) निरन्तर मारे, वैसे उस (वः) तुम्हारे (अन्यकृतम्) और से किये हुए (एनः) अपराध को हम लोग (मा) मत (भुजेम) भोगें (तत्) उस दुष्ट कर्म को (मा) मत (कर्म) करें ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! तुम किसी दुष्ट का अनुकरण मत करो, अपने शरीर को नष्ट मत करो तथा और के किये हुए अपराध के सङ्ग मत होओ ॥७॥