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Rigveda / 6 / 51 / 14

ग्रावा॑णः सोम नो॒ हि कं॑ सखित्व॒नाय॑ वाव॒शुः। ज॒ही न्य१॒॑त्रिणं॑ प॒णिं वृको॒ हि षः ॥१४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 51 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : ऋजिश्वाः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर किससे मित्रता कर कौन दूर करने योग्य हैं, इस विषयको कहते हैं ॥

पदपाठ : ग्रावा॑णः। सो॒म॒। नः॒। हि। क॒म्। स॒खि॒ऽत्व॒नाय॑। वा॒व॒शुः। ज॒हि। नि। अ॒त्रिण॑म्। प॒णिम्। वृकः॑। हि। सः ॥१४॥

पदार्थ : हे (सोम) प्रेरणा देनेवाले ! जो (ग्रावाणः) मेघों के समान (सखित्वनाय) मित्रपन के लिये (नः) हम लोगों को (हि) ही (वावशुः) चाहते हैं, वे (कम्) सुख को प्राप्त हों जो (अत्रिणम्) दूसरे का सर्वस्व हरनेवाला (पणिम्) व्यवहारकर्त्ता का संबन्ध करता है (सः, हि) वही (वृकः) चोर है, इस हेतु से इसे आप (नि, जही) निरन्तर मारो ॥१४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यदि धर्मात्मा विद्वान् जन धर्मिष्ठ विद्वानों के साथ मित्रता रखते हैं तो वे निरन्तर सुख को प्राप्त होकर मेघ के समान सबको बढ़ाके दुष्ट आचरण करनेवाले छलियों को शीघ्र मारते हैं ॥१४॥