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Rigveda / 6 / 52 / 13

विश्वे॑ देवाः शृणु॒तेमं हवं॑ मे॒ ये अ॒न्तरि॑क्षे॒ य उप॒ द्यवि॒ ष्ठ। ये अ॑ग्निजि॒ह्वा उ॒त वा॒ यज॑त्रा आ॒सद्या॒स्मिन्ब॒र्हिषि॑ मादयध्वम् ॥१३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 52 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : ऋजिश्वाः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को कौन बुला कर सत्कार करने योग्य हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : विश्वे॑। दे॒वाः॒। शृ॒णु॒त। इ॒मम्। हव॑म्। मे॒। ये। अ॒न्तरि॑क्षे। ये। उप॑। द्यवि॑। स्थ। ये। अ॒ग्नि॒ऽजि॒ह्वाः। उ॒त। वा॒। यज॑त्राः। आ॒ऽसद्य॑। अ॒स्मिन्। ब॒र्हिषि॑। मा॒द॒य॒ध्व॒म् ॥१३॥

पदार्थ : हे (विश्वे, देवाः) सब विद्वानो ! (ये) जो (अन्तरिक्षे) भीतर अविनाशी आकाश में (ये) जो (द्यवि) प्रकाश में (ये) जो (अग्निजिह्वाः) सत्य से प्रकाशमान जिह्वा जिन की (उत, वा) अथवा (यजत्राः) सङ्ग करने योग्य हों उन सब के साथ (मे) मेरे (इमम्) इस (हवम्) सुने पढ़े और जाने हुए विषय को (उप, शृणुत) समीप में सुनो और समीप में (स्थ) स्थिर होओ तथा (अस्मिन्) इस (बर्हिषि) उत्तम आसन वा स्थान में (आसद्य) बैठ के हम लोगों को (मादयध्वम्) आनन्दित करो ॥१३॥

भावार्थ : मनुष्यों को सदैव जो विमानस्थ, अन्तरिक्ष में, वा जो बिजुली की विद्या में कुशल हैं और जो पढ़ाने वा परीक्षा करने में निपुण, धर्मिष्ठ, आप्त विद्वान् हों; उनके निकट जाकर और उनको अपने समीप बुलाकर सत्कार कर इनसे सुनना चाहिये और सुना हुआ सुनाना चाहिये, जिससे सुनने में वा विज्ञान में श्रम न हो ॥१३॥