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Rigveda / 6 / 53 / 4

वि प॒थो वाज॑सातये चिनु॒हि वि मृधो॑ जहि। साध॑न्तामुग्र नो॒ धियः॑ ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 53 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : पूषा | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : वि। प॒थः। वाज॑ऽसातये। चि॒नु॒हि। वि। मृधः॑। ज॒हि॒। साध॑न्ताम्। उ॒ग्र॒। नः॒। धियः॑ ॥४॥

पदार्थ : हे (उग्र) तेजस्वी सेनापति ! आप (वाजसातये) विज्ञान वा धन की प्राप्ति वा सङ्ग्राम के लिये (पथः) मार्ग से (वि, चिनुहि) सञ्चय करो तथा (मृधः) सङ्ग्रामों में प्रवृत दुष्टों को (वि, जहि) विशेषता से मारो जिससे (नः) हमारी (धियः) बुद्धियाँ कार्यों को (साधन्ताम्) सिद्ध करें ॥४॥

भावार्थ : हे राजन् ! आप उत्तम निर्भय मार्गों को बनाओ, उन में विपथगामियों को मारो, जिससे सब की बुद्धि उत्तम कर्मों की उन्नति करने के लिये प्रवृत्त हों ॥४॥