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Rigveda / 1 / 41 / 6

स रत्नं॒ मर्त्यो॒ वसु॒ विश्वं॑ तो॒कमु॒त त्मना॑ । अच्छा॑ गच्छ॒त्यस्तृ॑तः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 41 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : आदित्याः | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह रक्षा को प्राप्त होकर किसको प्राप्त होता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : सः । रत्न॑म् । मर्त्यः॑ । वसु॑ । विश्व॑म् । तो॒कम् । उ॒त । त्मना॑ । अच्छ॑ । ग॒च्छ॒ति॒ । अस्तृ॑तः॥

पदार्थ : जो (अस्तृतः) हिंसा रहित (मर्त्येः) मनुष्य है (सः) वह (त्मना) आत्मा मन वा प्राण से (विश्वम्) सब (रत्नम्) मनुष्यों के मनों के रमण करानेवाले (वसु) उत्तम से उत्तम द्रव्य (उत) और (तोकम्) सब उत्तम गुणों से युक्त पुत्रों को (अच्छ गच्छति) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है ॥६॥

भावार्थ : विद्वान् मनुष्यों से अच्छे प्रकार रक्षा किये हुए मनुष्य आदि प्राणी सब उत्तम से उत्तम पदार्थ और सन्तानों को प्राप्त होते हैं रक्षा के विना किसी पुरुष वा प्राणी की बढ़ती नहीं होती ॥६॥