Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 56 / 6

आ ते॑ स्व॒स्तिमी॑मह आ॒रेअ॑घा॒मुपा॑वसुम्। अ॒द्या च॑ स॒र्वता॑तये॒ श्वश्च॑ स॒र्वता॑तये ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 56 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : पूषा | छन्द : स्वराडुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर सब को विद्वानों के लिये क्या इच्छा करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। ते॒। स्व॒स्तिम्। ई॒म॒हे॒। आ॒रेऽअ॑घाम्। उप॑ऽवसुम्। अ॒द्य। च॒। स॒र्वऽता॑तये। श्वः। च॒। स॒र्वऽता॑तये ॥६॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! (सर्वतातये) सम्पूर्ण सुख सिद्ध करनेवाले यज्ञ के लिये (ते) तेरे लिये (अद्या) आज (च) और (श्वः) आगामी दिन (च) भी (सर्वतातये) सर्वसुख करनेवाले और पदार्थ के लिये (आरेअघाम्) जिसमें पाप दूर पहुँचे तथा (उपावसुम्) वा समीप धन आदि पदार्थ विद्यमान उस (स्वस्तिम्) सुख को हम (आ, ईमहे) अच्छे प्रकार माँगते हैं ॥६॥

भावार्थ : हे विद्वन् ! जिससे आप पापाचरण से अलग तथा सबके कल्याण करनेवाले हैं, इससे आपके लिये सदैव सुख की इच्छा हम लोग करें ॥६॥ इस सूक्त में उपदेशक, श्रोता और पूषा शब्द के अर्थ का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह छप्पनवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥