Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 41 / 8

मा वो॒ घ्नन्तं॒ मा शप॑न्तं॒ प्रति॑ वोचे देव॒यन्त॑म् । सु॒म्नैरिद्व॒ आ वि॑वासे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 41 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : वरुणमित्रार्यमणः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : सभाध्यक्ष आदि लोग प्रजाजनों के साथ क्या प्रतिज्ञा करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : मा । वः॒ । घ्नन्त॑म् । मा । शप॑न्तम् । प्रति॑ । वो॒चे॒ । दे॒व॒ऽयन्त॑म् । सु॒म्नैः । इत् । वः॒ । आ । वि॒वा॒से॒॥

पदार्थ : मैं (वः) मित्ररूप तुम को (घ्नन्तम्) मारते हुए जन से (मा प्रतिवोचे) संभाषण भी न करूं (वः) तुम को (शपंतम्) कोसते हुए मनुष्य से प्रिय (मा०) न बोलूं किन्तु (सुम्नैः) सुखों से सहित तुम को सुख देनेहारे (इत्) ही (देवयन्तम्) दिव्यगुणों की कामना करने हारे की (आविवासे) अच्छे प्रकार सेवा सदा किया करूं ॥८॥

भावार्थ : मनुष्य को योग्य है कि न अपने शत्रु और न मित्र के शत्रु में प्रीति करे मित्र की रक्षा और विद्वानों की प्रियवाक्य, भोजन वस्त्र पान आदि से सेवा सदा करनी चाहिये क्योंकि मित्र रहित पुरुष सुख की वृद्धि नहीं कर सकता; इससे विद्वान् लोग बहुत से धर्मात्माओं को मित्र करें ॥८॥