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Rigveda / 6 / 59 / 6

इन्द्रा॑ग्नी अ॒पादि॒यं पूर्वागा॑त्प॒द्वती॑भ्यः। हि॒त्वी शिरो॑ जि॒ह्वया॒ वाव॑द॒च्चर॑त्त्रिं॒शत्प॒दा न्य॑क्रमीत् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 59 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : भुरिगनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : बिजुली का जाननेवाला क्या कर सकता है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑। अ॒पात्। इ॒यम्। पूर्वा॑। आ। अ॒गा॒त्। प॒त्ऽवती॑भ्यः। हि॒त्वी। शिरः॑। जि॒ह्वया॑। वाव॑दत्। चर॑त्। त्रिं॒शत्। प॒दा। नि। अ॒क्र॒मी॒त् ॥६॥

पदार्थ : जो (जिह्वया) वाणी से (वावदत्) निरन्तर कहता है और जो (इयम्) यह (अपात्) पैररहित (पूर्वा) पूर्ण वा अग्रस्थ (पद्वतीभ्यः) पैरों से की हुई गतियों से (शिरः) शिर के तुल्य मुख्य वचन को (हित्वी) त्याग कर बिजुली (आ, अगात्) प्राप्त होती है तथा (त्रिंशत्) आकाश और प्रकाश को छोड़ कर सब भूमि आदि पदार्थरूपी (पदा) स्थानों को (नि, अक्रमीत्) क्रम-क्रम से पहुँचती और शीघ्र (चरत्) चलती है, इससे (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली को जानता है, वही मनुष्य बिजुली की विद्या को जाननेवाला होता है ॥६॥

भावार्थ : हे विद्वानो ! आप यदि बिजुली की विद्या को अच्छे प्रकार ग्रहण करो तो सब यानों से शीघ्र जाने को तथा और काम सिद्ध कर सकते हो ॥६॥