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Rigveda / 6 / 60 / 2

ता यो॑धिष्टम॒भि गा इ॑न्द्र नू॒नम॒पः स्व॑रु॒षसो॑ अग्न ऊ॒ळ्हाः। दिशः॒ स्व॑रु॒षस॑ इन्द्र चि॒त्रा अ॒पो गा अ॑ग्ने युवसे नि॒युत्वा॑न् ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 60 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : मनुष्य क्या करके सुख पाते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ता। यो॒धि॒ष्ट॒म्। अ॒भि। गाः। इ॒न्द्र॒। नू॒नम्। अ॒पः। स्वः॑। उ॒षसः॑। अ॒ग्ने॒। ऊ॒ळ्हाः। दिशः॑। स्वः॑। उ॒षसः॑। इ॒न्द्र॒। चि॒त्राः। अ॒पः। गाः। अ॒ग्ने॒। यु॒व॒से॒। नि॒युत्वा॑न् ॥२॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त (अग्ने) विद्वन् वा ! आप (स्वः) आदित्य (उषसः) प्रभातवेलाओं को जैसे वैसे (गाः) पृथिवी और (नूनम्) निश्चय से (अपः) कर्म को (युवसे) संयुक्त करते हो और जिनसे (दिशः) दिशायें (ऊळ्हाः) प्राप्त हुईं (ता) उनको जानकर तुम दोनों (अभि, योधिष्टम्) सब ओर से युद्ध करो। हे (इन्द्र) दुःखविदारक=दुःख के नाश करनेवाले वा (अग्ने) विद्वान् जन (नियुत्वान्) ईश्वर के समान न्यायाधीश ! आप (स्वः) आदित्य (उषसः) प्रभातवेलाओं के समान (चित्राः) चित्रविचित्र (अपः) उदक (गाः) और वाणियों को संयुक्त करते हो, इससे ईश्वर के समान न्यायकर्त्ता हो ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य वायु और बिजुली के तुल्य पराक्रमी होकर युद्ध का आचरण करें, वे उषाकाल को जैसे सूर्य उसी के समान प्रजाओं को न्याय से प्रकाश को प्राप्त कराय कर और सर्व दिशाओं में कीर्तिवाले हो अद्भुत वाणी, बलों और भूमि के राज्य को प्राप्त होते हैं ॥२॥