Rigveda / 6 / 61 / 7
उ॒त स्या नः॒ सर॑स्वती घो॒रा हिर॑ण्यवर्तनिः। वृ॒त्र॒घ्नी व॑ष्टि सुष्टु॒तिम् ॥७॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 61 | Mantra No : 7
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : sarasvatii | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : uta syaa naH sarasvatii ghoraa hiraNyavartaniH. vRRitraghnii vaShTi suShTutim .7.
Component Words : uta. syaa. naH. sarasvatii. ghoraa. hiraNya.avartaniH. vRRitra.aghnii. vaShTi. su.astutim .7.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : सरस्वती | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : फिर वह कैसी है, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : उ॒त। स्या। नः॒। सर॑स्वती। घो॒रा। हिर॑ण्यऽवर्तनिः। वृ॒त्र॒ऽघ्नी। व॒ष्टि॒। सु॒ऽस्तु॒तिम् ॥७॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (हिरण्यवर्त्तनिः) जिसमें विद्याव्यवहार का वर्त्ताव है वह (घोरा) दुष्टों को दुःख देनेवाली (वृत्रघ्नी) मेघ को हननेवाली बिजुली के समान (सरस्वती) विज्ञान भरी हुई वाणी (नः) हम लोगों को सुखी करती (स्या) वह (उत) भी हमारी (सुष्टुतिम्) सुन्दर प्रशंसा की (वष्टि) कामना करती है ॥७॥
भावार्थ : जो बिजुली की चमक दमक के समान सुन्दर शोभावाली विदुषी स्त्री घर के कार्यों की प्रकाश करनेवाली तथा सन्तानों की विद्या की कामना करती है, वही यहाँ सौभाग्यवती होती है ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : सरस्वती | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : पुनः सा कीदृशीत्याह ॥
पदपाठ : उ॒त। स्या। नः॒। सर॑स्वती। घो॒रा। हिर॑ण्यऽवर्तनिः। वृ॒त्र॒ऽघ्नी। व॒ष्टि॒। सु॒ऽस्तु॒तिम् ॥७॥
पदार्थ : (उत) (स्या) सा (नः) अस्माकम् (सरस्वती) विज्ञानयुक्ता वाणी (घोरा) दुष्टानां दुःखप्रदा (हिरण्यवर्त्तनिः) हिरण्यस्य विद्याव्यवहारस्य वर्त्तनिर्मार्गो यस्यां सा (वृत्रघ्नी) मेघहन्त्री विद्युदिव (वष्टि) कामयते (सुष्टुतिम्) शोभनां प्रशंसाम् ॥७॥
अन्वय : हे मनुष्या ! या हिरण्यवर्त्तनिर्घोरा वृत्रघ्नी सरस्वती नः सुखयति स्योत नोऽस्माकं सुष्टुतिं वष्टि ॥७॥
भावार्थ : या विद्युल्लतेव सुशोभा विदुषी स्त्री गृहकृत्यप्रकाशिनी सन्तानविद्यां कामयते सैव सौभाग्यवती जायते ॥७॥