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Rigveda / 6 / 61 / 13

प्र या म॑हि॒म्ना म॒हिना॑सु॒ चेकि॑ते द्यु॒म्नेभि॑र॒न्या अ॒पसा॑म॒पस्त॑मा। रथ॑इव बृह॒ती वि॒भ्वने॑ कृ॒तोप॒स्तुत्या॑ चिकि॒तुषा॒ सर॑स्वती ॥१३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 61 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : सरस्वती | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वह कैसी है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : प्र। या। म॒हि॒म्ना। म॒हिना॑सु। चेकि॑ते। द्यु॒म्नेभिः॑। अ॒न्याः। अ॒पसा॑म्। अ॒पःऽत॑मा। रथः॑ऽइव। बृ॒ह॒ती। वि॒ऽभ्वने॑। कृ॒ता। उ॒प॒ऽस्तुत्या॑। चि॒कि॒तुषा॑। सर॑स्वती ॥१३॥

पदार्थ : हे मनुष्या ! (या) जो (महिम्ना) बड़प्पन से (महिना) बड़ी (अपसाम्) कर्म करनेवालों में (अपस्तमा) अतीव कर्म करनेवाली और (रथइव) रमणीय आकाश के समान (बृहती) बढ़ती हुई (विभ्वने) विभुत्व के लिये (चिकितुषा) समझानेवाली (उपस्तुत्या) जिससे कि समीप स्तुति करता उससे (कृता) जगदीश्वर ने उत्पन्न की हुई (सरस्वती) जिसमें विज्ञान वर्त्तमान वह वाणी (द्युम्नेभिः) प्रकाश जो यशरूप हैं उनसे (अन्याः) प्रत्येक प्राणी के प्रति भिन्न-भिन्न है अर्थात् नाना प्रकार वाणी हैं [=नाना की वाणियाँ हैं] (आसु) उनमें जो (प्र, चेकिते) विज्ञान कराती उसको यथावत् जान के सत्य वाणी का अच्छे प्रकार प्रयोग करो ॥१३॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! विद्या, सुशिक्षा, सत्सङ्ग, सत्यभाषण और योगाभ्यासादिकों से निष्पन्न हुई वाणी यह व्याप्त वा समर्थ है, उसको तुम जानो ॥१३॥