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Rigveda / 6 / 62 / 1

स्तु॒षे नरा॑ दि॒वो अ॒स्य प्र॒सन्ता॒ऽश्विना॑ हुवे॒ जर॑माणो अ॒र्कैः। या स॒द्य उ॒स्रा व्युषि॒ ज्मो अन्ता॒न्युयू॑षतः॒ पर्यु॒रू वरां॑सि ॥१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 62 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अश्विनौ | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब बिजुली और अन्तरिक्ष कैसे हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : स्तु॒षे। नरा॑। दि॒वः। अ॒स्य। प्र॒ऽसन्ता॑। अ॒श्विना॑। हु॒वे॒। जर॑माणः। अ॒र्कैः। या। स॒द्यः। उ॒स्रा। वि॒ऽउषि॑। ज्मः। अन्ता॑न्। युयू॑षतः। परि॑। उ॒रु। वरां॑सि ॥१॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (जरमाणः) स्तुति करता हुआ मैं (अर्कैः) मन्त्रों से (या) जो (व्युषि) विशेष दाह के निमित्त (उस्रा) जिनकी किरणें विद्यमान वे (प्रसन्ता) विभाग करनेवाला (नरा) नायक (अश्विना) व्यापनशील बिजुली और अन्तरिक्ष (अस्य) इस (दिवः) प्रकाश के तथा (ज्मः) पृथिवी के (अन्तान्) समीपस्थ पदार्थों को (उरु) बहुत (वरांसि) उत्तम वस्तुओं को (सद्यः) शीघ्र (परि, युयूषतः) अच्छे प्रकार अलग-अलग करते उनकी (स्तुषे) स्तुति करता हूँ तथा (हुवे) ग्रहण करता हूँ, वैसे इनकी स्तुति कर तुम भी ग्रहण करो ॥१॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो अन्तरिक्ष और विद्युत् सर्वाधिकरण और सब पदार्थों के बीच ठहरे हुए वर्त्तमान हैं, उनके बीच बिजुली विभाग करनेवाली और अन्तरिक्ष आधार वर्त्तमान है, उनके गुणों को सब जानो ॥१॥