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Rigveda / 1 / 42 / 4

त्वं तस्य॑ द्वया॒विनो॒ऽघशं॑सस्य॒ कस्य॑ चित् । प॒दाभि ति॑ष्ठ॒ तपु॑षिम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 42 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : पूषा | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर इन पूर्वोक्त चोरों की क्या गति करनी चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : त्वम् । तस्य॑ । द्व॒या॒विनः॑ । अ॒घऽशं॑सस्य । कस्य॑ । चि॒त् । प॒दा । अ॒भि । ति॒ष्ठ॒ । तपु॑षिम्॥

पदार्थ : हे सेनासभाध्यक्ष ! (त्वम्) आप (तस्य) उस (द्वयाविनः) प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष औरों के पदार्थों को हरने वाले (कस्यचित्) किसी (अघशंसस्य) (तपुषिम्) चोरों की सेना को (पदाभितिष्ठ) बल से वशीभूत कीजिये ॥४॥

भावार्थ : न्याय करनेवाले मनुष्यों को उचित है कि किसी अपराधी चोर को दण्ड देने विना छोड़ना कभी न चाहिये, नहीं तो, प्रजा पीड़ायुक्त होकर नष्ट भ्रष्ट होने से राज्य का नाश होजाय; इस कारण प्रजा की रक्षा के लिये दुष्ट कर्म करनेवाले अपराध किये हुए माता-पिता, आचार्य्य और मित्र आदि को भी अपराध के योग्य ताड़ना अवश्य देनी चाहिये ॥४॥