Rigveda / 6 / 62 / 6
ता भु॒ज्युं विभि॑र॒द्भ्यः स॑मु॒द्रात्तुग्र॑स्य सू॒नुमू॑हथू॒ रजो॑भिः। अ॒रे॒णुभि॒र्योज॑नेभिर्भु॒जन्ता॑ पत॒त्रिभि॒रर्ण॑सो॒ निरु॒पस्था॑त् ॥६॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 62 | Mantra No : 6
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : ashvinau | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : taa bhujyu.m vibhiradbhyaH samudraattugrasya suunumuuhathuu rajobhiH. areNubhiryojanebhirbhujantaa patatribhirarNaso nirupasthaat .6.
Component Words : taa. bhujyum. vi.abhiH. at.abhyaH. samudraat. tugrasya. suunum. uuhathuH. rajaH.abhiH. areNu.abhiH. yojanebhiH. bhujantaa. patatri.abhiH. arNasaH. niH. upa.asthaat .6.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उनसे क्या सिद्ध होता है, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : ता। भु॒ज्युम्। विऽभिः॑। अ॒त्ऽभ्यः। स॒मु॒द्रात्। तुग्र॑स्य। सू॒नुम्। ऊ॒ह॒थुः॒। रजः॑ऽभिः। अ॒रे॒णुऽभिः॑। योज॑नेभिः। भु॒जन्ता॑। प॒त॒त्रिऽभिः॑। अर्ण॑सः। निः। उ॒पऽस्था॑त् ॥६॥
पदार्थ : हे विद्वानो ! जो बिजुली और वायु (विभिः) पक्षियों के समान (अद्भ्यः) जलों वा (समुद्रात्) सागर वा अन्तरिक्ष वा (अर्णसः) जल के (उपस्थात्) समीप स्थित होनेवाले से (पतत्रिभिः) गमनशीलों के समान (अरेणुभिः) रज जिनमें नहीं उन (योजनेभिः) अनेक योजनों से युक्त (रजोभिः) ऐश्वर्यप्रद मार्गों से (तुग्रस्य) बलिष्ठ (सूनुम्) सन्तान के समान वर्त्तमान को (नि, ऊहथुः) निरन्तर पहुँचाते और (भुजन्ता) पालना करनेवाले (भुज्युम्) भागेने योग्य आनन्द की पालना करते हैं (ता) उनको तुम जानो ॥६॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो बिजुली और वायु विमान आदि यानों को अन्तरिक्ष में पक्षियों के समान चलानेवाले वेग से पहुँचाते हैं, उनको समीपस्थ कर अभीष्ट सुखों को प्राप्त होओ ॥६॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्ताभ्यां किं सिध्यतीत्याह ॥
पदपाठ : ता। भु॒ज्युम्। विऽभिः॑। अ॒त्ऽभ्यः। स॒मु॒द्रात्। तुग्र॑स्य। सू॒नुम्। ऊ॒ह॒थुः॒। रजः॑ऽभिः। अ॒रे॒णुऽभिः॑। योज॑नेभिः। भु॒जन्ता॑। प॒त॒त्रिऽभिः॑। अर्ण॑सः। निः। उ॒पऽस्था॑त् ॥६॥
पदार्थ : (ता) तौ (भुज्युम्) भोक्तुं योग्यमानन्दम् (विभिः) पक्षिभिरिव (अद्भ्यः) उदकेभ्यः (समुद्रात्) सागरादन्तरिक्षाद्वा (तुग्रस्य) बलिष्ठस्य (सूनुम्) अपत्यमिव वर्त्तमानम् (ऊहथुः) प्रापयतः। अत्र पुरुषव्यत्ययः (रजोभिः) ऐश्वर्यप्रदैर्मार्गैः (अरेणुभिः) अविद्यमाना रेणवो वालुका येषु तैः (योजनेभिः) अनेकैर्योजनैर्युक्तैः (भुजन्ता) पालकौ (पतत्रिभिः) गमनशीलैः (अर्णसः) उदकस्य (निः) नितराम् (उपस्थात्) यः समीपे तिष्ठति तस्मात् ॥६॥
अन्वय : हे विद्वांसो ! यौ विद्युत्पवनौ विभिरिवाद्भ्यः समुद्रादर्णस उपस्थात् पतत्रिभिरिवारेणुभिर्योजनेभी रजोभिस्तुग्रस्य सूनुं निरूहथुर्भुजन्ता भुज्युं पालयतस्ता यूयं विजानीत ॥६॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या ! यौ विद्युत्पवनौ विमानादीनि यानान्यन्तरिक्षे पक्षिवद्गमयितारौ वेगेन वहतस्तावुपस्थाप्याभीष्टानि सुखानि प्राप्नुवन्तु ॥६॥