Rigveda / 6 / 63 / 1
क्व१॒॑त्या व॒ल्गू पु॑रुहू॒ताद्य दू॒तो न स्तोमो॑ऽविद॒न्नम॑स्वान्। आ यो अ॒र्वाङ्नास॑त्या व॒वर्त॒ प्रेष्ठा॒ ह्यस॑थो अस्य॒ मन्म॑न् ॥१॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 63 | Mantra No : 1
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : ashvinau | Metre : svaraaDbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : kva1tyaa valguu puruhuutaadya duuto na stomo.avidannamasvaan. aa yo arvaa~Nnaasatyaa vavarta preShThaa hyasatho asya manman .1.
Component Words : kva. tyaa. valguu iti. puru.ahuutaa. adya. duutaH. na. stomaH. avidat. namasvaan. aa. yaH. arvaak. naasatyaa. vavarta. preShThaa. hi. asathaH. asya. manman .1.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अश्विनौ | छन्द : स्वराड्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अब एकादश ऋचावाले तिरसठवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में सभासेनापति किसको प्राप्त होते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : क्व॑। त्या। व॒ल्गू इति॑। पु॒रु॒ऽहू॒ता। अ॒द्य। दू॒तः। न। स्तोमः॑। अ॒वि॒द॒त्। नम॑स्वान्। आ। यः। अ॒र्वाक्। नास॑त्या। व॒वर्त॑। प्रेष्ठा॑। हि। अस॑थः। अ॒स्य॒। मन्म॑न् ॥१॥
पदार्थ : हे (वल्गू) शोभन वाणीवाले (पुरुहूता) बहुतों से प्रशंसा को प्राप्त (प्रेष्ठा) अतीव प्रिय (नासत्या) सत्यस्वभावयुक्त सभासेनाधीशो ! (यः) जो (अर्वाक्) नीचे जानेवाला (अद्य) आज (नमस्वान्) बहुत अन्नयुक्त वा सत्कृत (स्तोमः) स्तुति करने योग्य (दूतः) समाचार पहुँचानेवाले के (न) समान जन (अविदत्) प्राप्त होता वा (क्व) कहाँ (अस्य) इसके (मन्मन्) विज्ञान में जो (आ, ववर्त्त) अच्छे प्रकार वर्त्तमान है (त्या, हि) वे ही तुम दोनों (असथः) होते हो ॥१॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो इस जगत् के विज्ञान के निमित्त प्रयत्न करते हैं, वे कहीं भी दुःखित नहीं होते हैं ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अश्विनौ | छन्द : स्वराड्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अथ सभासेनेशौ किं प्राप्नुत इत्याह ॥
पदपाठ : क्व॑। त्या। व॒ल्गू इति॑। पु॒रु॒ऽहू॒ता। अ॒द्य। दू॒तः। न। स्तोमः॑। अ॒वि॒द॒त्। नम॑स्वान्। आ। यः। अ॒र्वाक्। नास॑त्या। व॒वर्त॑। प्रेष्ठा॑। हि। अस॑थः। अ॒स्य॒। मन्म॑न् ॥१॥
पदार्थ : (क्व) (त्या) तौ (वल्गू) शोभनवाचौ। वल्गु इति वाङ्नाम। (निघं०१.११) (पुरुहूता) बहुभिः प्रशंसितौ (अद्य) इदानीम् (दूतः) समाचारप्रापकः (न) इव (स्तोमः) श्लाघनीयः (अविदत्) प्राप्नोति (नमस्वान्) बह्वन्नयुक्तः सत्कृतो वा (आ) (यः) (अर्वाक्) योऽधोञ्चति (नासत्या) सत्यस्वभावौ (ववर्त) वर्त्तते (प्रेष्ठा) अतिशयेन प्रियौ (हि) (असथः) भवथः (अस्य) (मन्मन्) मन्मनि विज्ञाने ॥१॥
अन्वय : हे वल्गू पुरुहूता प्रेष्ठा नासत्या ! योऽर्वागद्य नमस्वान् स्तोमो दूतो नाविदत् क्वास्य मन्मन्ना ववर्त्त त्या हि युवामसथः ॥१॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारः। येऽस्य जगतो विज्ञाने प्रयतन्ते ते क्वापि दुःखिता न भवन्ति ॥१॥