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Rigveda / 6 / 63 / 6

यु॒वं श्री॒भिर्द॑र्श॒ताभि॑रा॒भिः शु॒भे पु॒ष्टिमू॑हथुः सू॒र्यायाः॑। प्र वां॒ वयो॒ वपु॒षेऽनु॑ पप्त॒न्नक्ष॒द्वाणी॒ सुष्टु॑ता धिष्ण्या वाम् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 63 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अश्विनौ | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर राजादि किसके लिये किसको प्राप्त होके कैसे हों, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यु॒वम्। श्री॒भिः। द॒र्श॒ताभिः॑। आ॒भिः। शु॒भे। पु॒ष्टिम्। ऊ॒ह॒थुः॒। सू॒र्यायाः॑। प्र। वा॒म्। वयः॑। वपु॑षे। अनु॑। प॒प्त॒न्। नक्ष॑त्। वाणी॑। सुऽस्तु॑ता। धि॒ष्ण्या॒। वा॒म् ॥६॥

पदार्थ : हे (धिष्ण्या) दृढ प्रगल्भो ! जो (वाम्) तुम दोनों जैसे (वयः) पक्षी (पप्तन्) गिरते हैं, वैसे (शुभे) कल्याणरूपी (वपुषे) सुरूप के लिये (सुष्टुता) उत्तम प्रशंसा को प्राप्त (वाणी) वेदवाणी (अनु, नक्षत्) अनुकूलता से व्याप्त वा प्राप्त हो और जो (युवम्) तुम दोनों (दर्शताभिः) द्रष्टव्य (आभिः) इन (श्रीभिः) राजनीति की शोभाओं से (सूर्यायाः) उषासम्बन्धिनी प्रजा से वाणी की (पुष्टिम्) पुष्टि को (प्र, ऊहथुः) प्राप्त कराते हो वे (वाम्) तुम दोनों निरन्तर पुष्टि करो ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! यदि तुम लोग राज्य करने की और राज्यलक्ष्मी को प्राप्त करने की इच्छा करते हो तो प्रयत्न से और समस्त धन आदि से विद्यायुक्त वाणी को प्राप्त होओ और जैसे पक्षी अपने आश्रय को प्राप्त होते हैं, इसी प्रकार तुम धर्मयुक्त नीति को प्राप्त होकर जैसे उषाकाल दिन को, वैसे यश को प्रकाशित करो ॥ ३ ॥