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Rigveda / 6 / 66 / 6

त इदु॒ग्राः शव॑सा धृ॒ष्णुषे॑णा उ॒भे यु॑जन्त॒ रोद॑सी सु॒मेके॑। अध॑ स्मैषु रोद॒सी स्वशो॑चि॒राम॑वत्सु तस्थौ॒ न रोकः॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 66 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : मरुतः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर मनुष्य क्या करके कैसे हों, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ते। इत्। उ॒ग्राः। शव॑सा। धृ॒ष्णुऽसे॑नाः। उ॒भे इति॑। यु॒ज॒न्त॒। रोद॑सी॒ इति॑। सु॒मेके॒ इति॑ सु॒ऽमेके॑। अध॑। स्म॒। ए॒षु॒। रो॒द॒सी। स्वऽशो॑चिः। आ। अम॑वत्ऽसु। त॒स्थौ॒। न। रोकः॑ ॥६॥

पदार्थ : जो (धृष्णुषेणाः) दृढ सेनावाले (शवसा) बल से (उग्राः) तेजस्वी (उभे) दोनों (सुमेके) सुन्दर रूपवाले (रोदसी) आकाश और पृथिवी को (युजन्त) युक्त होते हैं (अध) तदनन्तर (स्म) ही (एषु) इन (अमवत्सु) प्रशंसित गृहवालों में (रोदसी) आकाश और पृथिवी के बीच (स्वशोचिः) अपनी दीप्तिवाला विद्युत् अग्नि (आ, तस्थौ) अच्छे प्रकार स्थित है और (न) नहीं (रोकः) शब्दायमान है (ते) वे सब (इत्) ही सुखी होते हैं ॥६॥

भावार्थ : जो मनुष्य बिजुली और पृथिवी की विद्या को लेकर दृढ़ सेनावाले होते हैं, उनको शत्रुजन रोक नहीं सकते तथा जो उत्तम घरों में निवास करते हैं, वे प्रकाशित बुद्धिवाले होते हैं ॥६॥