Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 66 / 9

प्र चि॒त्रम॒र्कं गृ॑ण॒ते तु॒राय॒ मारु॑ताय॒ स्वत॑वसे भरध्वम्। ये सहां॑सि॒ सह॑सा॒ सह॑न्ते॒ रेज॑ते अग्ने पृथि॒वी म॒खेभ्यः॑ ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 66 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य किसके लिये क्या धारण करके क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : प्र। चि॒त्रम्। अ॒र्कम्। गृ॒ण॒ते। तु॒राय॑। मारु॑ताय। स्वऽत॑वसे। भ॒र॒ध्व॒म्। ये। सहां॑सि। सह॑सा। सह॑न्ते। रेज॑ते। अ॒ग्ने॒। पृ॒थि॒वी। म॒खेभ्यः॑ ॥९॥

पदार्थ : हे विद्वानो ! (ये) जो (सहसा) बल वा उत्साह से (सहांसि) बलों को (सहन्ते) सहते हैं उनके लिये तुम (चित्रम्) अद्भुत (अर्कम्) अन्न वा वज्र को (प्र, भरध्वम्) अच्छे प्रकार धारण करो, हे (अग्ने) विद्वन् ! जैसे (मखेभ्यः) सङ्ग्राम आदि जो सङ्ग करने करने योग्य हैं उनके लिये (पृथिवी) भूमि (रेजते) कम्पित होती है तथा (स्वतवसे) अपने बल से युक्त (तुराय) शीघ्रता करने और (मारुताय) मनुष्यों के सहयोगी (गृणते) स्तुति करनेवाले विद्वान् के लिये अद्भुत अन्न वा वज्र को धारण करो ॥९॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे चलती हुई भूमि यज्ञसामग्री को उत्पन्न करती है, वैसे ही बड़े-बड़े शूरवीर विद्वानों के लिये अन्नादि पदार्थ और अस्त्र-शस्त्र समूह तथा उनकी विद्या की निरन्तर उन्नति करो, ऐसा होने से योग्य शत्रुओं को सहने और पराजय करने का सामर्थ्य उत्पन्न होता है, यह जानो ॥९॥