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Rigveda / 6 / 67 / 6

ता हि क्ष॒त्रं धा॒रये॑थे॒ अनु॒ द्यून्दृं॒हेथे॒ सानु॑मुप॒मादि॑व॒ द्योः। दृ॒ळ्हो नक्ष॑त्र उ॒त वि॒श्वदे॑वो॒ भूमि॒माता॒न्द्यां धा॒सिना॒योः ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 67 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर कौन सङ्ग करने योग्य और सुख के बढ़ानेवाले हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ता। हि। क्ष॒त्रम्। धा॒रये॑थे॒ इति॑। अनु॑। द्यून्। दृं॒हेथे॒ इति॑। सानु॑म्। उ॒प॒मात्ऽइ॑व। द्योः। दृ॒ळ्हः। नक्ष॑त्रः। उ॒त। वि॒श्वऽदे॑वः। भूमि॑म्। आ। अ॒ता॒न्। द्याम्। धा॒सिना॑। आ॒योः ॥६॥

पदार्थ : हे अध्यापक और उपदेशको ! जो (हि) जिस कारण से हैं (ता) वे तुम दोनों (अनु, द्यून्) प्रतिदिन (क्षत्रम्) राज्य वा धन को (धारयेथे) धारण करते हो तथा (द्योः) सूर्य की (उपमादिव) उपमा से जैसे वैसे (सानुम्) शिखर को (दृंहेथे) बढ़ाते हो जिनके सङ्ग से (विश्वदेवः) सब का प्रकाश करनेवाला (दृळ्हः) दृढ़ (उत) और (नक्षत्रः) जो नहीं नष्ट होता ऐसा होता हुआ (भूमिम्) भूमि और (द्याम्) मनोहर विद्या को प्राप्त होकर (धासिना) अन्न से (आयोः) जीवन को बढ़ाता है, उन पूर्वोक्त दोनों तथा उसको जो (आ, अतान्) सब ओर से प्रकाशित करें, वे निरन्तर सुखी होते हैं ॥६॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो अध्यापक और उपदेशक प्रतिदिन सूर्य के समान विद्याव्यवहार को सम्यक् प्रकाशित कर राज्य, धन और आयु को बढ़ाते, सब को सुख की धारणा कराते, जिनको प्राप्त होकर सब जन विद्वान् होते हैं, उनका सङ्ग निरन्तर करो ॥६॥