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Rigveda / 6 / 68 / 6

यं यु॒वं दा॒श्व॑ध्वराय देवा र॒यिं ध॒त्थो वसु॑मन्तं पुरु॒क्षुम्। अ॒स्मे स इ॑न्द्रावरुणा॒वपि॑ ष्या॒त्प्र यो भ॒नक्ति॑ व॒नुषा॒मश॑स्तीः ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 68 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्रावरुणौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर राजजन क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यम्। यु॒वम्। दा॒शुऽअ॑ध्वराय। दे॒वा॒। र॒यिम्। ध॒त्थः। वसु॑ऽमन्तम्। पु॒रु॒ऽक्षुम्। अ॒स्मे इति॑। सः। इ॒न्द्रा॒व॒रुणौ॒। अपि॑। स्या॒त्। प्र। यः। भ॒नक्ति॑। व॒नुषा॑म्। अश॑स्तीः ॥६॥

पदार्थ : हे (इन्द्रावरुणौ) बिजुली और वायु के समान वर्त्तमान सभासेनाधीशो ! (देवा) देनेवालो (युवम्) तुम दोनों (दाश्वध्वराय) जिससे अहिंसामय यज्ञ देने योग्य होता है उसके लिये (अस्मे) हम लोगों में (यम्) जिस प्रशस्त (रयिम्) धन (वसुमन्तम्) बहुत ऐश्वर्य्ययुक्त और (पुरुक्षुम्) बहुत अन्नवाले जन को (धत्थः) धारण करो (यः) जो (वनुषाम्) राज्य को माँगनेवाले शत्रुओं की (अशस्तीः) अप्रशंसाओ को (प्र, भनक्ति) अच्छे प्रकार मर्दित करता है (सः) सो (अपि) ही अतीव स्थिर (स्यात्) हो ॥६॥

भावार्थ : हे सभासेनाधीशो ! जो तुम लोग उत्तम बुद्धि और अतुल लक्ष्मी को हम लोगों में धरो तो हम लोग सदैव विजयी होकर विजय, राज्य और ऐश्वर्य्य को बढ़ावें ॥६॥