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Rigveda / 6 / 68 / 11

इन्द्रा॑वरुणा॒ मधु॑मत्तमस्य॒ वृष्णः॒ सोम॑स्य वृष॒णा वृ॑षेथाम्। इ॒दं वा॒मन्धः॒ परि॑षिक्तम॒स्मे आ॒सद्या॒स्मिन्ब॒र्हिषि॑ मादयेथाम् ॥११॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 68 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्रावरुणौ | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वे क्या करके क्या करावें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : इन्द्रा॑वरुणा। मधु॑मत्ऽतमस्य। वृष्णः॑। सोम॑स्य। वृ॒ष॒णा॒। आ। वृ॒षे॒था॒म्। इ॒दम्। वा॒म्। अन्धः॑। परि॑ऽसिक्तम्। अ॒स्मे इति॑। आ॒ऽसद्य। अ॒स्मिन्। ब॒र्हिषि॑। मा॒द॒ये॒था॒म् ॥११॥

पदार्थ : हे (इन्द्रावरुणा) बिजुली और वायु के समान वर्त्तमान (वृषणा) बलवान् राजा प्रजाजनो ! तुम (मधुमत्तमस्य) अतीव मधुरादिगुणयुक्त (वृष्णः) बल करनेवाले (सोमस्य) बड़ी बड़ी ओषधियों के रसों के सेवने से (आ, वृषेथाम्) बलिष्ठ होओ जिन (वाम्) तुम दोनों का (इदम्) यह (परिषिक्तम्) सब ओर से सींचा हुआ (अन्धः) अन्न है वे तुम (अस्मे) हम लोगों में वा हम को (अस्मिन्) इस (बर्हिषि) अवकाश में (आसद्य) बैठ के (मादयेथाम्) आनन्दित करो ॥११॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सोमलतादि रसयुक्त अन्न वा पान से आप आनन्दित होकर हमको आनन्दित करते हैं, वे ही सब से सत्कार करने योग्य होते हैं ॥११॥ इस सूक्त में वरुण के समान राजप्रजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह अड़सठवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ