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Rigveda / 6 / 70 / 6

ऊर्जं॑ नो॒ द्यौश्च॑ पृथि॒वी च॑ पिन्वतां पि॒ता मा॒ता वि॑श्व॒विदा॑ सु॒दंस॑सा। सं॒र॒रा॒णे रोद॑सी वि॒श्वशं॑भुवा स॒निं वाजं॑ र॒यिम॒स्मे समि॑न्वताम् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 70 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : द्यावापृथिव्यौ | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वे कैसे किसके तुल्य और क्या करते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ऊर्ज॑म्। नः॒। द्यौः। च॒। पृ॒थि॒वी। च॒। पि॒न्व॒ता॒म्। पि॒ता। मा॒ता। वि॒श्व॒ऽविदा॑। सु॒ऽदंस॑सा। सं॒र॒रा॒णे इति॑ स॒म्ऽर॒रा॒णे। रोद॑सी॒ इति॑। वि॒श्वऽश॑म्भुवा। स॒निम्। वाज॑म्। र॒यिम्। अ॒स्मे इति॑। सम्। इ॒न्व॒ता॒म् ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (विश्वविदा) जिनसे सर्व सुख को प्राप्त होते हैं (सुदंससा) जिनसे सुन्दर काम सिद्ध होते हैं (संरराणे) जो अच्छे प्रकार सुख देते हैं और (विश्वशंभुवा) जो सब के लिये सुख की भावना कराते वे (रोदसी) बहुपदार्थयुक्त द्यावापृथिवी (अस्मे) हम लोगों में (सनिम्) अच्छे प्रकार विभाग को और (वाजम्) विज्ञान वा अन्न तथा (रयिम्) धन को (सम्, इन्वताम्) उत्तमता से व्याप्त हों तथा (पिता) पिता के समान (द्यौः) सूर्य्य वा विद्युत् अग्नि (च) और (माता) माता के समान (पृथिवी) भूमि (च) भी (नः) हमारे लिये (ऊर्जम्) अन्न वा पराक्रम को (पिन्वताम्) सुखपूर्वक परिपूर्ण करें, उनको यथावत् जानो ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! आप, जो सूर्य पिता के समान, जो पृथिवी माता के समान ये दोनों सर्व सुख देने वा धन और ऐश्वर्य्य की प्राप्ति कराने वा मङ्गल करानेवाले उत्तम क्रियायुक्त और बल वा पराक्रम देनेवाले वर्त्तमान हैं, उनको उत्तम यत्न के साथ कैसे न जानो ॥६॥ इस सूक्त में द्यावापृथिवी और उनके समान अध्यापक और उपदेश वा ऋत्विक्, और यजमानों के काम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सत्तरवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥