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Rigveda / 1 / 43 / 2

यथा॑ नो॒ अदि॑तिः॒ कर॒त्पश्वे॒ नृभ्यो॒ यथा॒ गवे॑ । यथा॑ तो॒काय॑ रु॒द्रिय॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 43 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : रुद्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : यथा॑ । नः॒ । अदि॑तिः । कर॑त् । पश्वे॑ । नृऽभ्यः॑ । यथा॑ । गवे॑ । यथा॑ । तो॒काय॑ । रु॒द्रिय॑म्॥

पदार्थ : (यथा) जैसे (तोकाय) उत्पन्न हुए बालक के लिये (अदितिः) माता (यथा) जैसे (पश्वे) पशु समूह के लिये पशुओं का पालक (यथा) जैसे (नृभ्यः) मनुष्यों के लिये राजा (यथा) जैसे (गवे) इन्द्रियों के लिये जीव वा पृथिवी के लिये खेती करनेवाला (करत्) सुखों को करता है वैसे (नः) हम लोगों के लिये (रुद्रियम्) परमेश्वर वा पवनों का कर्म प्राप्त हो ॥२॥

भावार्थ : इस मंत्र में उपमाऽलंकार है। जैसे माता-पिता पुत्र के लिये, गोपाल पशुओं के लिये और राजसभा प्रजा के लिये सुखकारी होते हैं वैसे ही सुखों के करने और कराने वाले परमेश्वर और पवन भी हैं ॥२॥