Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 75 / 5

ब॒ह्वी॒नां पि॒ता ब॒हुर॑स्य पु॒त्रश्चि॒श्चा कृ॑णोति॒ सम॑नाव॒गत्य॑। इ॒षु॒धिः सङ्काः॒ पृत॑नाश्च॒ सर्वाः॑ पृ॒ष्ठे निन॑द्धो जयति॒ प्रसू॑तः ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 75 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : पायुर्भारद्वाजः | देवता : इषुधिः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वीरों को क्या धारण करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ब॒ह्वी॒नाम्। पि॒ता। ब॒हुर॑स्य। पु॒त्रः। चि॒श्चा। कृ॒णो॒ति॒। सम॑ना। अ॒व॒ऽगत्य॑। इ॒षु॒ऽधिः। सङ्काः॑। पृत॑नाः। च॒। सर्वाः॑। पृ॒ष्ठे। निऽन॑द्धः। ज॒य॒ति॒। प्रऽसू॑तः ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (बह्वीनाम्) बहुत बाणों की (पिता) पालना करनेवाले के समान (अस्य) इसके (बहुः) बहुत (पुत्रः) पुत्र के समान बाण (समना) सङ्ग्रामों को (अवगत्य) प्राप्त होकर (इषुधिः) धनुष् (चिश्चा) चीं चीं शब्द (कृणोति) करता है तथा (पृष्ठे) पीठ पर (निनद्धः) नित्य बंधा और (प्रसूतः) उत्पन्न होता हुआ (सर्वाः) समस्त (संकाः) संग्रामस्थ वैरियों की टोली (पृतनाः, च) और सेनाओं को (जयति) जीतता है, वह तुम लोगों को यथावत् बना कर धारण करना चाहिये ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे वीरपुरुषो ! यदि धनुष् को तुम धारण करो तो शत्रुओं को विदीर्ण करके पुत्रों के प्रति पिता जैसे वैसे प्रजा पालन करके समस्त शत्रुसेनाओं को जीत सको ॥५॥