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Rigveda / 6 / 75 / 9

स्वा॒दु॒षं॒सदः॑ पि॒तरो॑ वयो॒धाः कृ॑च्छ्रे॒श्रितः॒ शक्ती॑वन्तो गभी॒राः। चि॒त्रसे॑ना॒ इषु॑बला॒ अमृ॑ध्राः स॒तोवी॑रा उ॒रवो॑ व्रातसा॒हाः ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 75 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : पायुर्भारद्वाजः | देवता : रथगोपाः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर राजपुरुष कैसे हों, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : स्वा॒दु॒ऽसं॒सदः॑। पि॒तरः॑। व॒यः॒ऽधाः। कृ॒च्छ्रे॒ऽश्रितः॑। शक्ति॑ऽवन्तः। ग॒भी॒राः। चि॒त्रऽसे॑नाः। इषु॑ऽबलाः। अमृ॑ध्राः। स॒तःऽवी॑राः। उ॒रवः॑। व्रा॒त॒ऽस॒हाः ॥९॥

पदार्थ : हे राजन् ! जो (स्वादुषंसदः) स्वादिष्ठ अन्नों के भोगने को स्थिर होते वा न्याय करने को सभा में स्थिर होते हैं वा (वयोधाः) जो अवस्थाओं को धारण करते हैं वा (कृच्छ्रेश्रितः) जो अति दुःख में भी धर्म का आश्रय करते हैं वा (शक्तीवन्तः) प्रशंसित बहुत शक्ति विद्यमान जिनके वा (गभीराः) जो गम्भीर आशयवाले हैं वा (चित्रसेनाः) जिनकी चित्रविचित्र सेना है तथा (इषुबलाः) शस्त्र और अस्त्रों से युक्त जिनकी सेना और (अमृध्राः) जो अहिंसन करनेवाले (सतोवीराः) सत्त्व बल से युक्त (व्रातसाहाः) जो शत्रूसमूहों को सहते हैं, वे (उरवः) बहुत पुत्रों की (पितरः) पिता जैसे धर्मिष्ठ, वैसे विज्ञान और अवस्था से बढ़े हुए पालनेवाले जन प्रजा की पालना करते हुए धर्मिष्ठ मनुष्य हों, उनसे तुम प्रजाओं की पालना निरन्तर करो ॥९॥

भावार्थ : हे विद्वान् मनुष्यो ! तुम सभ्य, पिता के समान प्रजाजनों की पालना करनेवाले, बहुत अवस्था से युक्त और दुःख को पाकर न कंपनेवाले, सामर्थ्यवान्, गम्भीर आशय, अद्भुत सेना तथा शस्त्र और अस्त्रों की विद्या में कुशल, बल से युक्त, शत्रुसमूह के सहनेवाले और बहुत गुण कर्मों से युक्त राजा को ही राज्याभिषिञ्चन काम में अभिषिक्त करो ॥९॥