Rigveda / 6 / 75 / 19
यो नः॒ स्वो अर॑णो॒ यश्च॒ निष्ट्यो॒ जिघां॑सति। दे॒वास्तं सर्वे॑ धूर्वन्तु॒ ब्रह्म॒ वर्म॒ ममान्त॑रम् ॥१९॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 75 | Mantra No : 19
In English:
Seer : paayurbhaaradvaajaH | Devta : li~Ngoktaa sa~NgraamaashiShaH, devaa brahma cha | Metre : viraaDanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation Under Process
Verse : yo naH svo araNo yashcha niShTyo jighaa.msati. devaasta.m sarve dhuurvantu brahma varma mamaantaram .19.
Component Words : yaH. naH. svaH. araNaH. yaH. cha. niShTyaH. jighaa.msati. devaaH. tam. sarve. dhuurvantu. brahma. varma. mama. antaram .19.
In Hindi:
ऋषि : पायुर्भारद्वाजः | देवता : लिङ्गोक्ता सङ्ग्रामाशिषः, देवा ब्रह्म च | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : फिर सेनाध्यक्ष सङ्ग्राम में क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : यः। नः॒। स्वः। अर॑णः। यः। च॒। निष्ट्यः॑। जिघां॑सति। दे॒वाः। तम्। सर्वे॑। धू॒र्व॒न्तु॒। ब्रह्म॑। वर्म॑। मम॑। अन्त॑रम् ॥१९॥
पदार्थ : हे सेनापति ! (यः) जो (नः) हमारे (स्वः) अपना (अरणः) सङ्ग्राम रहित यथावत् सङ्ग्राम नहीं करता (यः, च) और जो (निष्ट्यः) शब्द से ढिठाई कराने योग्य दूरस्थ होते हुए तथा अपनी सेना को (जिघांसति) मारने की इच्छा करता है (तम्) उसको (सर्वे) सब (देवाः) विद्वान् जन (धूर्वन्तु) मारें तथा (मम) मेरा (अन्तरम्) समीप में रमता हुआ (ब्रह्म) सर्वव्यापक चेतन (वर्म) कवच के समान रक्षा करनेवाला हो ॥१९॥
भावार्थ : सेनापति के जो अपने भृत्य उत्साह से युद्ध न करें और जो अपने नौकरों के मारने की इच्छा करें, उन सब को विद्वान् और अधीश शीघ्र मारें तथा युद्ध के समय सब वीर परमेश्वर ही को अपना रक्षा करनेवाला जानें ॥१९॥ इस सूक्त में वर्म अर्थात् कवच बख्तर आदि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह श्रीमान् परमहंसपरिव्राजकाचार्य्य परमविद्वान् श्रीमद्विरजानन्दसरस्वती स्वामीजी के शिष्य श्रीमान् दयानन्दसरस्वतीस्वामी जी के बनाये हुए संस्कृत और आर्यभाषा से सुभूषित अच्छे-अच्छे प्रमाणों से युक्त, ऋग्वेदभाष्य के छठे मण्डल में छठा अनुवाक और पचहत्तरवाँ सूक्त और छठा मण्डल भी तथा पञ्चमाष्टक के प्रथमाध्याय में बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : पायुर्भारद्वाजः | देवता : लिङ्गोक्ता सङ्ग्रामाशिषः, देवा ब्रह्म च | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : पुनः सेनाध्यक्षाः संग्रामे किं कुर्य्युरित्याह ॥
पदपाठ : यः। नः॒। स्वः। अर॑णः। यः। च॒। निष्ट्यः॑। जिघां॑सति। दे॒वाः। तम्। सर्वे॑। धू॒र्व॒न्तु॒। ब्रह्म॑। वर्म॑। मम॑। अन्त॑रम् ॥१९॥
पदार्थ : (यः) (नः) अस्माकम् (स्वः) स्वकीयः (अरणः) सङ्ग्रामरहितो यथावत्सङ्ग्रामं न करोति (यः) (च) (निष्ट्यः) शब्देन धर्षितुं योग्यो दूरस्थः सन् (जिघांसति) हन्तुमिच्छति (देवाः) विद्वांसः (तम्) (सर्वे) (धूर्वन्तु) हिंसन्तु (ब्रह्म) सर्वव्यापकं चेतनम् (वर्म) वर्म्मेव रक्षकम् (मम) (अन्तरम्) यदन्ते समीपे रमते तत् ॥१९॥
अन्वय : हे सेनापते ! यो नः स्वोऽरणो यश्च निष्ट्यः स्वकीयं सैन्यं जिघांसति तं सर्वे देवा धूर्वन्तु ममान्तरं ब्रह्म वर्म्मेव रक्षकं भवतु ॥१९॥
भावार्थ : सेनापतेर्ये स्वभृत्या उत्साहेन न युध्येयुर्ये च स्वभृत्यान् जिघांसन्ति तान् सर्वान् विद्वांसोऽध्यक्षाश्च सद्यो घ्नन्तु तथा युद्धसमये सर्वे वीराः परमेश्वरमेव स्वरक्षकं विजानन्त्विति ॥१९॥ अत्र वर्मादिगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य्याणां परमविदुषां श्रीमद्विरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिना विरचिते संस्कृतार्यभाषाविभूषिते सुप्रमाणयुक्त ऋग्वेदभाष्ये षष्ठे मण्डले षष्ठोऽनुवाकः पञ्चसप्ततितमं सूक्तं षष्ठं मण्डलं च पञ्चमाष्टके प्रथमेऽध्याये द्वाविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥