Rigveda / 7 / 1 / 4
प्र ते अ॒ग्नयो॒ऽग्निभ्यो॒ वरं॒ निः सु॒वीरा॑सः शोशुचन्त द्यु॒मन्तः॑। यत्रा॒ नरः॑ स॒मास॑ते सुजा॒ताः ॥४॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 1 | Mantra No : 4
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : agniH | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : pra te agnayo.agnibhyo vara.m niH suviiraasaH shoshuchanta dyumantaH. yatraa naraH samaasate sujaataaH .4.
Component Words : pra. te. agnayaH. agni.abhyaH. varam. niH. su.aviiraasaH. shoshuchanta. dyu.amantaH. yatra. naraH. sam.aaasate. su.ajaataaH .4.
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर अग्नि किससे प्रकट करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : प्र। ते। अ॒ग्नयः॑। अ॒ग्निऽभ्यः॑। वर॑म्। निः। सु॒ऽवीरा॑सः। शो॒शु॒च॒न्त॒। द्यु॒ऽमन्तः॑। यत्र॑। नरः॑। स॒म्ऽआस॑ते। सु॒ऽजा॒ताः ॥४॥
पदार्थ : जो (सुवीरासः) सुन्दर वीर (नरः) पुरुषार्थ को प्राप्त करने हारे विद्वान् हैं (ते) वे (यत्र) जिस व्यवहार में (अग्निभ्यः) अग्नि के परमाणुओं से (सुजाताः) अच्छे प्रकार प्रकट हुए (द्युमन्तः) बहुत दीप्तिवाले (अग्नयः) विद्युत् आदि अग्नि उत्पन्न होते हैं उसमें (निः, शोशुचन्त) निरन्तर शुद्धि करते और उनसे (वरम्) उत्तम व्यवहार को (प्र, समासते) सम्यक् प्राप्त होते हैं, वैसे इसको प्रकट करके तुम लोग भी उत्तम सुख को प्राप्त होओ ॥४॥
भावार्थ : जो मनुष्य अग्नि से अग्नि को उत्पन्न कर सिद्ध कामनावाले होके सर्वोत्तम सुख पाते हैं, वे जगत् में अच्छे प्रसिद्ध होते हैं ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनरग्निः कस्माज्जनयितव्य इत्याह ॥
पदपाठ : प्र। ते। अ॒ग्नयः॑। अ॒ग्निऽभ्यः॑। वर॑म्। निः। सु॒ऽवीरा॑सः। शो॒शु॒च॒न्त॒। द्यु॒ऽमन्तः॑। यत्र॑। नरः॑। स॒म्ऽआस॑ते। सु॒ऽजा॒ताः ॥४॥
पदार्थ : (प्र) (ते) (अग्नयः) विद्युदादयः (अग्निभ्यः) पावकपरमाणुभ्यः (वरम्) उत्तमं व्यवहारम् (निः) नितराम् (सुवीरासः) शोभनाश्च ते वीराश्च (शोशुचन्त) शोधयन्ति (द्युमन्तः) द्यौर्बह्वी दीप्तिर्वर्त्तते येषु ते (यत्र) यस्मिन् व्यवहारे। अत्र ऋचि तुनुघेति दीर्घः। (नरः) पुरुषार्थेनाप्तव्यप्रापकाः (समासते) सम्यक् प्राप्नुवन्ति (सुजाताः) सुष्ठु प्रसिद्धाः ॥४॥
अन्वय : ये सुवीरासो नरस्ते यत्राग्निभ्यः सुजाता द्युमन्तोऽग्नयो जायन्ते तत्र निः शोशुचन्त तेभ्यो वरं प्र समासते तथैतं यूयमपि जनयित्वोत्तमं सुखं प्राप्नुथ ॥४॥
भावार्थ : ये मनुष्या अग्नेरग्निमुत्पाद्य सिद्धकामा भूत्वाऽनुत्तमं सुखं प्राप्नुवन्ति ते जगति सुप्रसिद्धा भवन्ति ॥४॥