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Rigveda / 7 / 1 / 11

मा शूने॑ अग्ने॒ नि ष॑दाम नृ॒णां माशेष॑सो॒ऽवीर॑ता॒ परि॑ त्वा। प्र॒जाव॑तीषु॒ दुर्या॑सु दुर्य ॥११॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 1 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर ये राजादि क्या न करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : मा। शूने॑। अ॒ग्ने॒। नि। स॒दा॒म॒। नृ॒णाम्। मा। अ॒शेष॑सः। अ॒वीर॑ता। परि॑। त्वा॒। प्र॒जाऽव॑तीषु। दुर्या॑सु। दु॒र्य॒ ॥११॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्विन् ! जो (अवीरता) वीरों का अभाव है उससे (नृणाम्) नायकों में (मा, निषदाम) निरन्तर स्थित न हों (शूने) शीघ्रकारिणी सेना में (अशेषसः) सम्पूर्ण हम (त्वा) तेरे (मा) न (परि) सब ओर से निरन्तर स्थित हों। हे (दुर्य्य) घरों में वर्त्तमान ! जिस कारण (प्रजावतीषु) प्रशस्त सन्तानों से युक्त (दुर्यासु) घरों में हुई रीतियों में सुखपूर्वक निरन्तर स्थित हों, वैसा कीजिये ॥११॥

भावार्थ : हे क्षत्रिय-कुल में हुए राजपुरुषो ! तुम कातर मत होओ। विरोध से परस्पर युद्ध करके निःशेष मत होओ। सनातन राजनीति से प्रजाओं का पालन कर कीर्त्तिवाले होओ ॥११॥