Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 1 / 16

अ॒यं सो अ॒ग्निराहु॑तः पुरु॒त्रा यमीशा॑नः॒ समिदि॒न्धे ह॒विष्मा॑न्। परि॒ यमेत्य॑ध्व॒रेषु॒ होता॑ ॥१६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 1 | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒यम्। सः। अ॒ग्निः। आऽहु॑तः। पु॒रु॒ऽत्रा। यम्। ईशा॑नः। सम्। इत्। इ॒न्धे। ह॒विष्मा॑न्। परि॑। यम्। एति॑। अ॒ध्व॒रेषु॑। होता॑ ॥१६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यम्) जिसको (ईशान) जगदीश्वर (सम्, इन्धे) सम्यक् प्रकाशित करता है और (यम्) जिसको (हविष्मान्) देने योग्य बहुत वस्तुओं सहित (होता) होम करनेवाला (अध्वरेषु) हिंसारहित संग्रामादि व्यवहारों में (परि, एति) सब ओर से प्राप्त होता है (सः, अयम् इत्) सो वही (अग्निः) विद्युत् अग्नि (आहुतः) सम्यक् स्वीकार किया हुआ (पुरुत्रा) बहुत कार्य्यों को सिद्ध करता है ॥१६॥

भावार्थ : हे विद्वानो ! ईश्वर ने जिसलिये बनाया है, जिसलिये ऋत्विज् और यजमान सेवन करते हैं, तदर्थ वह अग्नि तुम लोगों से बहुत व्यवहारों में प्रयुक्त किया हुआ अनेक कार्य्यों का सिद्ध करनेवाला होता है ॥१६॥