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Rigveda / 7 / 2 / 2

नरा॒शंस॑स्य महि॒मान॑मेषा॒मुप॑ स्तोषाम यज॒तस्य॑ य॒ज्ञैः। ये सु॒क्रत॑वः॒ शुच॑यो धियं॒धाः स्वद॑न्ति दे॒वा उ॒भया॑नि ह॒व्या ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 2 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : आप्रियः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को किसका सेवन करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : नरा॒शंस॑स्य। म॒हि॒मान॑म्। ए॒षा॒म्। उप॑। स्तो॒षा॒म॒। य॒ज॒तस्य॑। य॒ज्ञैः। ये। सु॒ऽक्रत॑वः। शुच॑यः। धि॒य॒म्ऽधाः। स्वद॑न्ति। दे॒वाः। उ॒भया॑नि। ह॒व्या ॥२॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (ये) जो (सुक्रतवः) उत्तम प्रज्ञावाले (शुचयः) पवित्र (धियन्धाः) उत्तम कर्मों के धारण करनेवाले (देवाः) विद्वान् लोग (उभयानि) शरीर और आत्मा के पुष्टिकारक (हव्या) भोजन के योग्य पदार्थों को (स्वदन्ति) अच्छे स्वादपूर्वक खाते और (यज्ञैः) सङ्गति के योग्य साधनों से (यजतस्य) सङ्ग करने योग्य (नराशंसस्य) मनुष्यों से प्रशंसा किये हुए तथा अन्न का भोग करनेवाले के (एषाम्) इनकी (महिमानम्) महिमा की हम लोग (उप, स्तोषाम) समीप प्रशंसा करें ॥२॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! तुम को चाहिये कि सदैव विद्वानों के अनुकरण से शरीर और आत्मा के बल को बढ़ानेवाले खानपानों का सेवन किया करो, जिससे तुम्हारी महिमा बढ़े ॥२॥