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Rigveda / 7 / 2 / 8

आ भार॑ती॒ भार॑तीभिः स॒जोषा॒ इळा॑ दे॒वैर्म॑नु॒ष्ये॑भिर॒ग्निः। सर॑स्वती सारस्व॒तेभि॑र॒र्वाक् ति॒स्रो दे॒वीर्ब॒र्हिरेदं स॑दन्तु ॥८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 2 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : आप्रियः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर स्त्री-पुरुष कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। भार॑ती। भार॑तीभिः। स॒ऽजोषाः॑। इळा॑। दे॒वैः। म॒नु॒ष्ये॑भिः। अ॒ग्निः। सर॑स्वती। सा॒र॒स्व॒तेभिः॑। अ॒र्वाक्। ति॒स्रः। दे॒वीः। ब॒र्हिः। आ। इ॒दम्। स॒द॒न्तु॒ ॥८॥

पदार्थ : हे विद्वानो ! जैसे (भारतीभिः) तुल्य विदुषी स्त्रियों के साथ (भारती) शीघ्र शास्त्रों को धारण कर, वाणी के तुल्य सब की रक्षक विदुषी (सजोषाः) तुल्य प्रीति को सेवनेवाली (देवैः) सत्यवादी विद्वानों (मनुष्येभिः) और मिथ्यावादी मनुष्यों से (इळा) स्तुति के योग्य (सारस्वतेभिः) वाणी विद्या में कुशलों से (सरस्वती) विज्ञानयुक्त वाणी (अर्वाक्) पुनः (अग्निः) अग्नि के तुल्य शुद्ध (तिस्रः) तीन प्रकार की (देवीः) उत्तम स्त्रियाँ (इदम्) इस (बर्हिः) उत्तम घर वा शरीर को (आ, सदन्तु) अच्छे प्रकार प्राप्त हों, वैसे ही तुम लोग विद्वानों के साथ (आ) आओ ॥८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! यदि तुम लोग प्रशंसित वाणी और बुद्धि को प्राप्त हो तो सूर्य के तुल्य प्रकाशित होकर इस जगत् में कल्याण करनेवाले होओ ॥८॥