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Rigveda / 7 / 3 / 2

प्रोथ॒दश्वो॒ न यव॑सेऽवि॒ष्यन्य॒दा म॒हः सं॒वर॑णा॒द्व्यस्था॑त्। आद॑स्य॒ वातो॒ अनु॑ वाति शो॒चिरध॑ स्म ते॒ व्रज॑नं कृ॒ष्णम॑स्ति ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 3 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराट्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह विद्युत् कैसी है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : प्रोथ॑त्। अश्वः॑। न। यव॑से। अ॒वि॒ष्यन्। य॒दा। म॒हः। स॒म्ऽवर॑णात्। वि। अस्था॑त्। आत्। अ॒स्य॒। वातः॑। अनु॑। वा॒ति॒। शो॒चिः। अध॑। स्म॒। ते॒। व्रज॑नम्। कृ॒ष्णम्। अ॒स्ति॒ ॥२॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! जो (ते) आपका (कृष्णम्) आकर्षण करने योग्य (व्रजनम्) गमन (अस्ति) है, उसके सम्बन्ध में (महः) महान् (संवरणात्) सम्यक् स्वीकार से (शोचिः) प्रदीपन (अध, स्म) और इसके अनन्तर ही (अस्य) इसके सम्बन्ध में (वातः) वायु (यदा) जब (अनु, वाति) नुकूल चलता है (आत्) अनन्तर तब (यवसे) भक्षण के अर्थ (अविष्यन्) रक्षा करता (प्रोथत्) और शब्द करता हुआ (अश्वः) घोड़े के (न) समान शीघ्र यह अग्निमार्ग को (वि, अस्थात्) व्याप्त होता है ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जब मनुष्य लोग अग्नियान से गमन और विद्युत् से समाचारों को ग्रहण करें तब ये शीघ्र कार्य्यों को सिद्ध कर सकते हैं ॥२॥