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Rigveda / 1 / 44 / 2

जुष्टो॒ हि दू॒तो असि॑ हव्य॒वाह॒नोऽग्ने॑ र॒थीर॑ध्व॒राणा॑म् । स॒जूर॒श्विभ्या॑मु॒षसा॑ सु॒वीर्य॑म॒स्मे धे॑हि॒ श्रवो॑ बृ॒हत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 44 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्सतःपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर विद्वानों के सङ्ग के गुणों का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : जुष्टः॑ । हि । दू॒तः । असि॑ । ह॒व्य॒ऽवाहनः । अग्ने॑ । र॒थीः । अ॒ध्व॒राणा॑म् । स॒ऽजूः । अ॒श्विऽभ्या॑म् । उ॒षसा॑ । सु॒ऽवीर्य॑म् । अ॒स्मे इति॑ । धे॒हि॒ । श्रवः॑ । बृ॒हत्॥

पदार्थ : हे (अग्ने) पावक के समान राजविद्या के जाननेवाले विद्वान् ! (हि) जिस कारण आप (जुष्टः) प्रसन्न प्रकृति और (दूतः) शत्रुओं को ताप करानेवाले होकर (अध्वराणाम्) अहिंसनीय यज्ञों को सिद्ध करते (रथीः) प्रशंसनीय रथयुक्त (हव्यवाहनः) देने लेने योग्य वस्तुओं को प्राप्त होने (सजूः) अपने तुल्यों के सेवन करनेवाले (असि) हो इससे (अस्मे) हम लोगों में (अश्विभ्याम्) वायु जल (उषसा) प्रातःकाल में सिद्ध हुई क्रिया से सिद्ध किये हुए (बृहत्) बड़े (सुवीर्य्यम्) उत्तम पराक्रम कारक (श्रवः) सब विद्या के श्रवण का निमित्त अन्न को (धेहि) धारण कीजिये ॥२॥

भावार्थ : कोई मनुष्य विद्वानों के सङ्ग के विना विद्या को प्राप्त, शत्रु को जीतके उत्तम पराक्रम चक्रवर्त्ति राज्य लक्ष्मी के प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता और अग्नि जल आदि के योग के विना उत्तम व्यवहार की सिद्धि भी नहीं कर सकता ॥२॥