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Rigveda / 7 / 5 / 7

स जाय॑मानः पर॒मे व्यो॑मन्वा॒युर्न पाथः॒ परि॑ पासि स॒द्यः। त्वं भुव॑ना ज॒नय॑न्न॒भि क्र॒न्नप॑त्याय जातवेदो दश॒स्यन् ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 5 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : वैश्वानरः | छन्द : स्वराट्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह जगदीश्वर क्या करता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। जाय॑मानः। प॒र॒मे। विऽओ॑मन्। वा॒युः। न। पाथः॑। परि॑। पा॒सि॒। स॒द्यः। त्वम्। भुव॑ना। ज॒नय॑न्। अ॒भि। क्र॒न्। अप॑त्याय। जा॒त॒ऽवे॒दः॒। द॒श॒स्यन् ॥७॥

पदार्थ : हे परमेश्वर ! जो (परमे) उत्तम (व्योमन्) आकाश के तुल्य व्यापक आप में (जायमानः) उत्पन्न होता हुआ योगीजन (वायुः, न) वायु के तुल्य (पाथः) पृथिव्यादि को (सद्यः) शीघ्र (एति) प्राप्त होता है (सः) वह आप से उन्नति को प्राप्त होता है। हे (जातवेदः) उत्पन्न हुए सब को जाननेवाले ! जो (त्वम्) आप (भुवना) सब लोकों को (जनयन्) उत्पन्न करते हुए (अपत्याय) माता जैसे सन्तान के लिये, वैसे कामनाओं को (दशस्यन्) पूर्ण करते हुए सब को (अभि, क्रन्) पूर्ण करते हुए (परि, पासि) सब ओर से रक्षा करते हो, इससे उपासना के योग्य हैं ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो अपत्य के लिये माता के तुल्य कृपालु, रक्षक, योगी के तुल्य सब काम देनेवाला, सब विश्व का कर्त्ता, सब का रक्षक ईश्वर है, उसी की नित्य उपासना करो ॥७॥