Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 44 / 5

स्त॒वि॒ष्यामि॒ त्वाम॒हं विश्व॑स्यामृत भोजन । अग्ने॑ त्रा॒तार॑म॒मृतं॑ मियेध्य॒ यजि॑ष्ठं हव्यवाहन ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 44 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : उपरिष्टाद्विराड् बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर कैसे को ग्रहण करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : स्त॒वि॒ष्यामि॑ । त्वाम् । अ॒हम् । विश्व॑स्य । अ॒मृ॒त॒ । भो॒ज॒न॒ । अग्ने॑ । त्रा॒तार॑म् । अ॒मृत॑म् । मि॒ये॒ध्य॒ । यजि॑ष्ठम् । ह॒व्य॒ऽवा॒ह॒न॒॥

पदार्थ : (अमृत) अविनाशिस्वरूप (भोजन) पालनकर्त्ता (मियेध्य) प्रमाण करने (हव्यवाहन) लेने देने योग्य पदार्थों को प्राप्त करानेवाले (अग्ने) परमेश्वर (अहम्) मैं (विश्वस्य) सब जगत् के (त्रातारम्) रक्षा (यजिष्ठम्) अत्यन्त यजन करनेवाले (अमृतम्) नित्य स्वरूप (त्वा) तुझ ही की (स्तविष्यामि) स्तुति करूंगा ॥५॥

भावार्थ : विद्वानों को योग्य है कि इस सब जगत् के रक्षक मोक्ष देने, विद्या काम आनन्द के देने वा वा उपासना करने योग्य परमेश्वर को छोड़ अन्य किसी का भी ईश्वरभाव से आश्रय न करें ॥५॥