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Rigveda / 7 / 15 / 2

यः पञ्च॑ चर्ष॒णीर॒भि नि॑ष॒साद॒ दमे॑दमे। क॒विर्गृ॒हप॑ति॒र्युवा॑ ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 15 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वे संन्यासी और गृहस्थ परस्पर कैसे वर्त्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यः। पञ्च॑। च॒र्ष॒णीः। अ॒भि। नि॒ऽस॒साद॑। दमे॑ऽदमे। क॒विः। गृ॒हऽप॑तिः। युवा॑ ॥२॥

पदार्थ : (यः) जो (कविः) उत्तम ज्ञान को प्राप्त हुआ संन्यासी (दमेदमे) घर-घर में (पञ्च) पाँच (चर्षणीः) मनुष्यों वा प्राणों को (अभि, निषसाद) स्थिर करे उसका (युवा) पूर्ण ब्रह्मचर्य्य के साथ वर्त्तमान (गृहपतिः) घर का रक्षक युवा पुरुष निरन्तर सत्कार करे ॥२॥

भावार्थ : संन्यासी जन सदा सब जगह भ्रमण करे और गृहस्थ इस विरक्त का सत्कार करे और इससे उपदेश सुने ॥२॥