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Rigveda / 7 / 15 / 15

त्वं नः॑ पा॒ह्यंह॑सो॒ दोषा॑वस्तरघाय॒तः। दिवा॒ नक्त॑मदाभ्य ॥१५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 15 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : आर्च्युष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर राणी राजा, प्रजा-जनों के प्रति कैसे वर्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वम्। नः॒। पा॒हि॒। अंह॑सः। दोषा॑ऽवस्तः। अ॒घ॒ऽय॒तः। दिवा॑। नक्त॑म्। अ॒दा॒भ्य॒ ॥१५॥

पदार्थ : हे (अदाभ्य) रक्षा करने योग्य राजन् ! (त्वम्) आप (दोषावस्तः) दिन-रात (अघायतः) अपने को पाप चाहते हुए दुष्ट के सङ्ग से और (दिवानक्तम्) रात्रि दिन सब समय में (अंहसः) अपराध से (नः) हमको आप (पाहि) रक्षित कीजिये, बचाइये ॥१५॥

भावार्थ : जैसे राजा पुरुषों की निरन्तर रक्षा करे, वैसे राणी प्रजा की स्त्रियों की नित्य रक्षा करे ॥१५॥ इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से राजा और रानी के कृत्यों का वर्णन करने से इस सूक्त की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह पन्द्रहवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥