Rigveda / 7 / 17 / 5
वंस्व॒ विश्वा॒ वार्या॑णि प्रचेतः स॒त्या भ॑वन्त्वा॒शिषो॑ नो अ॒द्य ॥५॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 17 | Mantra No : 5
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : agniH | Metre : saamniipa~NktiH | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : va.msva vishvaa vaaryaaNi prachetaH satyaa bhavantvaashiSho no adya .5.
Component Words : va.msva. vishvaa. vaaryaaNi. pracheta iti pra.achetaH. satyaaH. bhavantu. aa.ashiShaH. naH. adya .5.
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : साम्नीपङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर अध्यापक से विद्यार्थी जन क्या पूछें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : वंस्व॑। विश्वा॑। वार्या॑णि। प्र॒चे॒त॒ इति॑ प्रऽचेतः। स॒त्याः। भ॒व॒न्तु॒। आ॒ऽशिषः॑। नः॒। अ॒द्य ॥५॥
पदार्थ : हे (प्रचेतः) उत्तम बुद्धि से युक्त पुरुष ! आप (विश्वा) सब (वार्याणि) ग्रहण करने योग्य विद्वानों का (वंस्व) सेवन कीजिये जिससे (अद्य) आज (नः) हमारी (आशिषः) इच्छा (सत्याः) सत्य (भवन्तु) होवें ॥५॥
भावार्थ : हे अध्यापक ! आप विवेक से सत्य शास्त्रों को पढ़ाइये और सुशिक्षा करिये, जिससे हम लोग सत्य कामनावाले हों ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : साम्नीपङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनरध्यापकं प्रति विद्यार्थिनः किं पृच्छेयुरित्याह ॥
पदपाठ : वंस्व॑। विश्वा॑। वार्या॑णि। प्र॒चे॒त॒ इति॑ प्रऽचेतः। स॒त्याः। भ॒व॒न्तु॒। आ॒ऽशिषः॑। नः॒। अ॒द्य ॥५॥
पदार्थ : (वंस्व) संभज (विश्वा) सर्वाणि (वार्याणि) वरणीयानि प्रज्ञानानि (प्रचेतः) प्रकर्षेण प्रज्ञया युक्त (सत्याः) सत्सु साध्व्यः (भवन्तु) (आशिषः) इच्छा (नः) अस्माकम् (अद्य) अस्मिन् अहनि ॥५॥
अन्वय : हे प्रचेतस्त्वं विश्वा वार्याणि वंस्व यतो नोऽद्याऽऽशिषः सत्या भवन्तु ॥५॥
भावार्थ : हे अध्यापक ! त्वं विवेकेन सत्यानि शास्त्राण्यध्यापय सुशिक्षां कुरु येन वयं सत्यकामा भवेम ॥५॥